उप्र की राजनीति में एमएलसी ए.के. शर्मा का उदय भाजपा के लिए संजीवनी से कम नहीं

mlc ak sharma

लखनऊ। उप्र की राजनीति में इस समय एक नाम सबसे अधिक चर्चा का विषय बना हुआ है और वह नाम है एमएलसी ए.के. शर्मा। 11 जनवरी 2021 को सामान्य समय से लगभग दो साल पहले स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) लेकर भाजपा की सदस्यता ग्रहण करने की साथ ही उप्र से विधानपरिषद का सदस्य बनकर ए.के. शर्मा का राजनीति में पदार्पण किसी धमाके से कम नहीं था।

नरेन्द्र मोदी के सीएम से लेकर पीएम तक के राजनैतिक सफ़र में उनके साथ लगभग 20 सालों तक काम कर चुके ए.के. शर्मा ने अपनी कर्मठता व कार्यकुशलता के जरिए प्रधानमंत्री का जो विश्वास अर्जित किया वह आज भी कायम है।

भाजपा के शीर्ष नेतृत्त्व व पीएम मोदी ने ए.के. शर्मा को यूं ही उप्र की राजनीति में नहीं उतार दिया। इसके पीछे एक राजनैतिक समझ है।

एक तो भाजपा ए.के. शर्मा की कर्मठता व 30 सालों के प्रशासनिक अनुभव का लाभ सीधे तौर पर जनता को दिलाना चाहती है इसलिए उन्हें संवैधानिक पद (एमएलसी) सौंपकर जनता की सेवा का मौक़ा दे दिया।

अब राजनीतिक दल हैं तो पार्टी का हित और वोटों का गणित तो देखेंगे ही। ए.के. शर्मा भूमिहार ब्राह्मण जाति से आते हैं जिनकी जनसँख्या आंकड़ों के मुताबिक उप्र में लगभग 5 प्रतिशत है।

देखने में यह संख्या भले ही कम लगे लेकिन जातिगत रूप से मजबूत एकता होने के नाते बड़ी हो जाती है। प्रदेश में भूमिहारों की संख्या पूर्वांचल की करीब 70 से 75 सीटों को प्रभावित करती है।

साथ ही भूमिहारों के ब्राह्मण समाज का ही एक अंग होने के नाते उनका भी समर्थन ए.के. शर्मा को मिल सकता है, जो प्रदेश में लगभग 20 प्रतिशत हैं।

इस तरह देखा जाय तो यह जनसंख्या लगभग 25 प्रतिशत होती है जो कि अच्छी खासी है और लगभग 150 विधानसभा क्षेत्र को प्रभावित कर सकती है।

कोरोना की दूसरी लहर के दौरान ए.के. शर्मा ने वाराणसी सहित पूर्वांचल के लगभग 22 जिलों में जिस तरह जाति-धर्म से ऊपर उठकर मानवता की सेवा की उससे उन्हें सर्व-समाज का समर्थन मिल रहा है।


दूसरी ओर मनोज सिन्हा के जम्मू-कश्मीर का गवर्नर बनने के बाद भाजपा के पास कोई बड़ा भूमिहार नेता नहीं था। ए.के. शर्मा के साथ सबसे बड़ा प्लस पॉइंट उनका 30 सालों का प्रशासनिक अनुभव है।

भाजपा के चुनावी प्रबंधक व विश्लेषक इस सब पर गहरी दृष्टि रख रहे हैं और शायद इसीलिए ए.के. शर्मा को प्रदेश मंत्रिमंडल में बड़ी जिम्मेदारी सौंपकर सक्रिय किए जाने की जरूरत भाजपा शिद्दत से महसूस कर रही है।

वर्तमान में देखें तो सच्चाई यही है कि भाजपा सरकार को लेकर प्रदेश की जनता में नाराजगी है। इस नाराजगी के कारण कई हैं पर कारण से ज्यादा निवारण जरूरी है।

भाजपा देख रही है कि वर्तमान नेतृत्त्व के बूते यूपी फतह करना दूर की कौड़ी है और अगर भाजपा को केंद्र की सत्ता बनाए रखनी है तो यूपी जीतना बेहद जरूरी है।

आंकड़े व इतिहास भी यही बताता है कि जिसका यूपी उसी की दिल्ली। भाजपा की दोनों बार की केंद्र सरकारों (2014 व 2019) में उप्र का जबर्दस्त समर्थन रहा है इसलिए भाजपा व संघ दिल्ली की सत्ता को लेकर कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहता।

अब सवाल उठता है भाजपा की प्रदेश की राजनीति में ए.के. शर्मा को लेकर संतुलन कैसे साधा जाय? हालांकि ए.के. शर्मा के नजदीकी लोग बताते हैं कि व्यक्तिगत रूप से उनकी कोई राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा नहीं है।

बेहद सरल व मिलनसार व्यक्तित्त्व के स्वामी ए.के. शर्मा सिर्फ प्रधानमंत्री की इच्छा के नाते राजनीति में उतरे हैं क्योंकि वो पीएम मोदी को एक राजनेता व स्टेटसमैन के तौर पर बेहद पसंद करते हैं।

बताते हैं कि पीएम मोदी भी ए.के. शर्मा के तमाम गुणों को देखते हुए उन्हें एक जनसेवक के रूप में देखना व उनका उपयोग करना चाहते थे और शायद इसीलिए उप्र जैसे बड़े सूबे में उन्हें भेजा गया।

अब आने वाले दिनों में ए.के. शर्मा उप्र की राजनीति में कहां फिट होते हैं यह तो भविष्य के गर्त में है लेकिन इतना जरूर है कि पीएम मोदी को ए.के. शर्मा के रूप में अपनी जैसी सोच वाला एक जनसेवक अवश्य मिल गया है।

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