
Bengal की खाड़ी में भारत का बड़ा सैन्य ट्रायल, GPS जैमिंग से बढ़ेगी ताकत…
Bengal Gps Jamming Trial : भारत एक बार फिर अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रहा है। 11–12 अप्रैल 2026 को India बंगाल की खाड़ी में दो दिवसीय ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS) जैमिंग ट्रायल करेगा। इस ट्रायल के लिए संबंधित एजेंसियों द्वारा NOTAM (Notice to Airmen) जारी कर दिया गया है, जिससे यह साफ है कि यह एक महत्वपूर्ण और योजनाबद्ध सैन्य अभ्यास है।
यह ट्रायल ऐसे समय में हो रहा है जब क्षेत्रीय सुरक्षा हालात संवेदनशील बने हुए हैं और भारत अपनी रक्षा क्षमताओं को लगातार अपग्रेड कर रहा है।
GNSS जामिंग क्या है और क्यों जरूरी है?
GNSS यानी ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम में GPS, GLONASS, Galileo और भारत का NavIC जैसे सिस्टम शामिल होते हैं। इस ट्रायल का मुख्य उद्देश्य इन सैटेलाइट आधारित सिग्नलों को बाधित करने वाली तकनीकों का परीक्षण करना है। आधुनिक युद्ध में दुश्मन के ड्रोन, मिसाइल और लड़ाकू विमानों की दिशा और लोकेशन काफी हद तक इन सिग्नलों पर निर्भर होती है। ऐसे में यदि इन सिग्नलों को बाधित कर दिया जाए, तो दुश्मन की सटीकता और क्षमता पर सीधा असर पड़ता है।
यह अभ्यास भारत की इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। आज के दौर में युद्ध सिर्फ हथियारों की ताकत से नहीं, बल्कि डिजिटल सिस्टम, सैटेलाइट नेटवर्क और डेटा कंट्रोल से भी तय होते हैं। ऐसे में भारत का यह प्रयास भविष्य के हाई-टेक युद्ध के लिए तैयारी के रूप में देखा जा रहा है।
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Pakistan Angle: बयान के बाद बढ़ी सतर्कता
हाल ही में Pakistan के रक्षा मंत्री Khawaja Asif द्वारा Kolkata को लेकर दिए गए बयान के बाद भारत की सुरक्षा एजेंसियां अधिक सतर्क हो गई हैं।
हालांकि इस बयान को औपचारिक सैन्य कार्रवाई नहीं माना गया है, लेकिन भारत किसी भी संभावित खतरे को नजरअंदाज नहीं कर रहा है।
जारी किया गया नोटम
जानकारी के अनुसार, इस बारे में वायुसेना समेत कई विभागों को नोटम जारी किया गया है। हालांकि यह ट्रायल पूरी तरह नियंत्रित परिस्थितियों में किया जाएगा ताकि क्षेत्र में संचालित नागरिक विमानन और समुद्री यातायात पर कोई खतरा न हो।
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बंगाल की खाड़ी को ही क्यों चुना गया?
बंगाल की खाड़ी को परीक्षण स्थल इसलिए चुना गया है क्योंकि यह भारत के समुद्री सुरक्षा ढांचे और हिंद महासागर क्षेत्र के महत्वपूर्ण ऑपरेशनल क्षेत्रों के करीब है। इस क्षेत्र में परीक्षण करने से हवाई हमलों की वास्तविक सटिकता का पता चल सकेगा।
- सिग्नल बाधित करने की सीमा
- इंटरफेरेंस की तीव्रता
- सिस्टम की स्थिरता
- वास्तविक परिस्थितियों में उपकरणों की प्रभावशीलता
GNSS जैमिंग तकनीक का उपयोग दुश्मन के प्रिसिजन गाइडेड हथियार, ड्रोन नेटवर्क-आधारित सैन्य प्रणालियों को कमजोर करने में किया जा सकता है। इससे भारत की नौसेना और तटीय सुरक्षा परिसंपत्तियों की सुरक्षा क्षमता मजबूत होगी।
यह कदम साफ दिखाता है कि भविष्य की लड़ाइयों में जीत केवल हथियारों से नहीं, बल्कि तकनीक और सिग्नल कंट्रोल से तय होगी।
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