ईरान-अमेरिका तनाव के बीच भारत एक्टिव, खाड़ी में उतरे मोदी के ‘3 मास्टरमाइंड’

India West Asia Relation: ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव में फिलहाल ‘पॉज’ जरूर लगा है, लेकिन हालात अब भी पूरी तरह सामान्य नहीं हैं। दो हफ्ते के युद्धविराम के ऐलान के बाद जहां शांति की उम्मीद जगी, वहीं इजरायल द्वारा लेबनान पर हमलों ने क्षेत्र की स्थिति को और जटिल बना दिया है। ऐसे माहौल में भारत ने तेजी से कूटनीतिक सक्रियता बढ़ा दी है।

मोदी सरकार के ‘तीन धुरंधर’ मैदान में
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने खाड़ी देशों के साथ संपर्क मजबूत करने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। इस कूटनीतिक मिशन में तीन प्रमुख चेहरे सक्रिय नजर आ रहे हैं।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर संयुक्त अरब अमीरात के दौरे पर जा रहे हैं, जहां वे क्षेत्रीय हालात और द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा करेंगे।
वहीं पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी कतर में ऊर्जा सुरक्षा को लेकर अहम बातचीत कर रहे हैं।
इसके अलावा कुवैत समेत अन्य खाड़ी देशों के साथ भी बैकचैनल डिप्लोमेसी जारी है।

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भारत क्यों बढ़ा रहा है संपर्क?
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव का सीधा असर भारत के रणनीतिक और आर्थिक हितों पर पड़ता है। खाड़ी देश भारत के लिए न केवल ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा स्रोत हैं, बल्कि वहां लाखों भारतीय कामगार भी रहते हैं। कतर से LNG सप्लाई, UAE और सऊदी अरब से कच्चे तेल का आयात भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है।

ऐसे में किसी भी अस्थिरता का असर तेल की कीमतों, व्यापार और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा पर पड़ सकता है। इसी को देखते हुए भारत पहले से ही एक्टिव होकर अपने संबंध मजबूत कर रहा है, ताकि किसी भी संकट की स्थिति में बेहतर समन्वय बना रहे।

पाकिस्तान और क्षेत्रीय राजनीति का एंगल
पाकिस्तान में प्रस्तावित शांति वार्ता में शामिल होने से ईरान का इनकार भी इस पूरे समीकरण को और जटिल बना रहा है। इससे साफ है कि क्षेत्रीय राजनीति में भरोसे की कमी बनी हुई है और हालात कभी भी बदल सकते हैं।

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आगे की रणनीति क्या?
भारत की कोशिश है कि वह इस पूरे संकट में संतुलन बनाए रखते हुए अपने हितों को सुरक्षित रखे। एक तरफ वह खाड़ी देशों के साथ रिश्तों को मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक मंचों पर शांति और स्थिरता की वकालत भी जारी है।

भारत की कूटनीतिक सक्रियता
ईरान-अमेरिका युद्धविराम भले ही अस्थायी राहत लेकर आया हो, लेकिन मध्य-पूर्व में अनिश्चितता अभी खत्म नहीं हुई है। ऐसे में भारत की कूटनीतिक सक्रियता यह दिखाती है कि वह किसी भी संभावित संकट के लिए पहले से तैयारी कर रहा है और अपने रणनीतिक हितों को सुरक्षित रखने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता।

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