
Sabarimala सुनवाई में नया मोड़! समलैंगिकता से एडल्ट्री तक पहुंची बहस…
Supreme Court Hearing Update: सुप्रीम कोर्ट में चल रही सबरीमला मामले की सुनवाई अब एक नए और व्यापक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। धार्मिक स्थलों में महिलाओं के साथ भेदभाव मामले में सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को दूसरे दिन की सुनवाई जारी है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा- कोई सेक्युलर अदालत किसी धार्मिक प्रथा को सिर्फ अंधविश्वास नहीं कह सकती, क्योंकि उसके पास ऐसा तय करने की विशेषज्ञता नहीं होती।
मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े इस विवाद ने अब समलैंगिकता, एडल्ट्री (व्यभिचार) और संवैधानिक नैतिकता जैसे बड़े मुद्दों को भी अपने दायरे में शामिल कर लिया है।
सबरीमला से आगे बढ़ी बहस
सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। मूल रूप से यह मामला सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़ा है, लेकिन अब यह बहस केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं रह गई है।
सुनवाई के दौरान यह सवाल उठाया जा रहा है कि धार्मिक परंपराएं बनाम मौलिक अधिकार—इन दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
तुषार मेहता ने उठाए बड़े सवाल
सरकार की ओर से पक्ष रखते हुए तुषार मेहता ने जेंडर इक्वालिटी और संवैधानिक नैतिकता को लेकर महत्वपूर्ण तर्क दिए।
उन्होंने कहा:
- कई न्यायिक फैसलों में “पश्चिमी दर्शन” का प्रभाव देखने को मिलता है
- भारतीय समाज की अपनी सांस्कृतिक और पारंपरिक सोच है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
- संवैधानिक मूल्यों की व्याख्या करते समय स्थानीय सामाजिक संदर्भ भी अहम होने चाहिए
यह भी पढ़ें…
Ceasefire के बीच भारत अलर्ट! Iran में फंसे नागरिकों के लिए अहम सलाह…
समलैंगिकता और एडल्ट्री का जिक्र क्यों?
सुनवाई के दौरान अदालत में पुराने फैसलों के उदाहरण दिए गए, जिनमें:
- समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करना
- एडल्ट्री कानून को असंवैधानिक घोषित करना
जैसे मामलों का हवाला दिया गया। इन उदाहरणों के जरिए यह तर्क रखा गया कि अदालत ने पहले भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और समानता को प्राथमिकता दी है।
अब सवाल यह है कि क्या यही सिद्धांत धार्मिक परंपराओं पर भी लागू होंगे?
संवैधानिक बनाम सामाजिक नैतिकता
इस बहस का सबसे अहम पहलू यही बन गया है कि:
- संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) क्या सर्वोपरि है?
- या फिर सामाजिक और धार्मिक परंपराओं को भी बराबर महत्व मिलना चाहिए?
यही टकराव इस केस को जटिल और ऐतिहासिक बना रहा है।
यह भी पढ़ें…
पांच राज्यों के चुनाव में ‘धर्म की एंट्री’? आचार संहिता के बीच सियासी घमासान
क्यों अहम है यह मामला?
सबरीमला केस का फैसला केवल एक मंदिर या एक परंपरा तक सीमित नहीं रहेगा।
इसका असर हो सकता है:
- अन्य धार्मिक स्थलों पर लागू नियमों पर
- जेंडर इक्वालिटी से जुड़े मामलों पर
- धार्मिक स्वतंत्रता बनाम मौलिक अधिकार की व्याख्या पर
सबरीमला मामले की सुनवाई अब भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर रही है—क्या आधुनिक संवैधानिक मूल्यों को प्राथमिकता दी जाए या पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं को? आने वाला फैसला न केवल इस विवाद को सुलझाएगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि भारत में धर्म, समाज और कानून के बीच संतुलन किस दिशा में आगे बढ़ेगा।
यह भी पढ़ें…





