यूपी के इस मुख्यमंत्री का था खौफ! 10:15 के बाद सचिवालय में एंट्री बंद, मंत्री भी रहे बेबस…

Veer Bahadur Singh Story: उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई मुख्यमंत्री आए और गए। किसी ने अपने बड़े राजनीतिक फैसलों से पहचान बनाई तो कोई अपनी जनसभाओं और राजनीतिक अंदाज के लिए याद किया गया। लेकिन यूपी के एक मुख्यमंत्री ऐसे भी रहे, जिनकी चर्चा आज भी उनके अनुशासन और समय की पाबंदी को लेकर होती है। कहा जाता है कि उनके कार्यकाल में सुबह 10:15 बजे के बाद सचिवालय का मुख्य गेट बंद कर दिया जाता था। फिर चाहे कोई अधिकारी हो, कर्मचारी हो या सरकार का मंत्री—देर से आने पर किसी को भी राहत नहीं मिलती थी। इतना ही नहीं, एक बार तो अपने ही मंत्री की एक दिन की तनख्वाह तक कटवा दी गई थी।

यह कहानी है उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता वीर बहादुर सिंह की। उनके बारे में कहा जाता है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने सरकार के कामकाज में समय और अनुशासन को सबसे ज्यादा महत्व दिया। उनका मानना था कि अगर सरकार के कर्मचारी और अधिकारी ही समय पर दफ्तर नहीं पहुंचेंगे तो शासन-व्यवस्था कैसे सुधरेगी?

कौन थे वीर बहादुर सिंह?
वीर बहादुर सिंह उत्तर प्रदेश की राजनीति के बड़े नेताओं में गिने जाते हैं। वह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। उनका राजनीतिक सफर गांव और जमीनी राजनीति से शुरू होकर सत्ता के शीर्ष तक पहुंचा।

वीर बहादुर सिंह का जन्म 18 फरवरी 1935 को गोरखपुर जिले के हरनही गांव में हुआ था. कांग्रेस की राजनीति में वह तेजी से आगे बढ़े और 24 सितंबर 1985 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. करीब तीन साल तक उन्होंने प्रदेश की कमान संभाली. बाद में वह केंद्र सरकार में संचार मंत्री भी रहे. उनकी पहचान विकास कार्यों के साथ-साथ सख्त प्रशासन और तेज फैसले लेने वाले नेता के रूप में भी रही. उनके बारे में कहा जाता है कि वह सरकारी व्यवस्था में अनुशासन और जवाबदेही को बेहद जरूरी मानते थे।

10:15 बजे के बाद सचिवालय में नो एंट्री!
वीर बहादुर सिंह के मुख्यमंत्री बनने के बाद सचिवालय में समय को लेकर सख्ती की चर्चा खूब होने लगी। कहा जाता है कि उन्होंने साफ निर्देश दे रखा था कि सुबह 10:15 बजे के बाद सचिवालय का मुख्य गेट बंद कर दिया जाए।

इसका मतलब साफ था—जो कर्मचारी, अधिकारी या मंत्री समय पर नहीं पहुंचे, उनके लिए उस दिन सचिवालय में प्रवेश आसान नहीं था। खास बात यह थी कि इस नियम में किसी को विशेष छूट नहीं दी जाती थी।

बताया जाता है कि वीर बहादुर सिंह का मानना था कि सरकार के कामकाज में देरी का असर सीधे जनता पर पड़ता है। अगर अधिकारी समय पर दफ्तर नहीं आएंगे तो फाइलें अटकेंगी, फैसले देर से होंगे और आम लोगों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ेंगे।

मंत्री की भी कटवा दी थी एक दिन की सैलरी!
वीर बहादुर सिंह की सख्ती का सबसे चर्चित किस्सा उनके एक मंत्री से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि एक दिन उनके मंत्रिमंडल का एक मंत्री समय पर सचिवालय नहीं पहुंच पाया। मंत्री के देर से आने की जानकारी जब मुख्यमंत्री तक पहुंची तो उन्होंने नियमों के मुताबिक कार्रवाई का आदेश दे दिया।

इसके बाद मंत्री की एक दिन की तनख्वाह काट दी गई।
इस घटना के बाद पूरे सचिवालय में चर्चा होने लगी। कर्मचारियों और अधिकारियों के बीच यह संदेश साफ चला गया कि मुख्यमंत्री के बनाए नियमों से किसी को भी छूट नहीं मिलने वाली है। चाहे वह सरकार का मंत्री ही क्यों न हो।

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‘समय सबसे बड़ा अनुशासन’ था वीर बहादुर सिंह का मंत्र
वीर बहादुर सिंह के बारे में कहा जाता है कि वह समय को लेकर बेहद गंभीर थे। उनके लिए समय की पाबंदी सिर्फ कर्मचारियों के लिए बनाया गया कोई सरकारी नियम नहीं था, बल्कि यह शासन चलाने का एक जरूरी हिस्सा था।

उनका मानना था कि अगर मुख्यमंत्री और मंत्री समय पर काम शुरू करेंगे तो नीचे के अधिकारी और कर्मचारी भी उसी अनुशासन का पालन करेंगे। यही वजह थी कि सचिवालय में समय को लेकर उनकी सख्ती की मिसाल दी जाती है।

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क्यों आज भी याद किया जाता है यह किस्सा?
आज के दौर में जब सरकारी दफ्तरों में समय पर पहुंचने और कामकाज को लेकर अक्सर सवाल उठते रहते हैं, तब वीर बहादुर सिंह का यह किस्सा और भी दिलचस्प हो जाता है।

हालांकि यह घटना कई साल पुरानी है, लेकिन 10:15 बजे सचिवालय का गेट बंद होने और मंत्री की सैलरी कटने का किस्सा आज भी उत्तर प्रदेश की राजनीतिक चर्चाओं में सुनाया जाता है। यही वजह है कि वीर बहादुर सिंह को यूपी के उन मुख्यमंत्रियों में याद किया जाता है, जिन्होंने प्रशासन में अनुशासन को लेकर बेहद सख्त रवैया अपनाया था।

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