
UP Crime: चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर यूपी पुलिस का बड़ा एक्शन, कानपुर से आरोपी गिरफ्तार
फोन में बच्चों की अश्लील सामग्री रखने पर यूपी पुलिस का बड़ा एक्शन। कानपुर से आरोपी गिरफ्तार, वाराणसी में केस दर्ज।
UP News: उत्तर प्रदेश में बच्चों के खिलाफ होने वाले साइबर अपराधों पर शिकंजा कसने के लिए यूपी पुलिस और साइबर क्राइम सेल ने बड़ी कार्रवाई की है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और मोबाइल फोन में बच्चों की अश्लील सामग्री (Child Sexual Abuse Material – CSAM) देखने, डाउनलोड करने और स्टोरेज करने के मामले में पुलिस ने कड़ा रुख अपनाया है।
इस कड़ी में कानपुर में एक युवक को अपने मोबाइल और क्लाउड स्टोरेज में बच्चों के अश्लील वीडियो/तस्वीरें रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है, वहीं वाराणसी में भी इस तरह की संदिग्ध गतिविधियों को लेकर FIR दर्ज किया गया है।
नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल से मिली टिप
मिली जानकारी के अनुसार, अमेरिका स्थित ‘नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एंड एक्सप्लॉइटेड चिल्ड्रेन’ (NCMEC) और भारत के गृह मंत्रालय के ‘नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल’ (NCPR) के जरिए पुलिस को संदिग्ध आईपी एड्रेस (IP Address) और सोशल मीडिया अकाउंट्स की रिपोर्ट मिली थी।
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कानपुर में कार्रवाई: कानपुर साइबर सेल ने टेक्निकल सर्विलांस और डेटा ट्रैकिंग के आधार पर आरोपी की लोकेशन को ट्रेस किया। जांच में आरोपी के मोबाइल फोन और क्लाउड अकाउंट से बच्चों से जुड़ी प्रतिबंधित अश्लील सामग्री बरामद हुई, जिसके बाद उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया।
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वाराणसी में केस दर्ज: इसी तरह की ऑनलाइन निगरानी के दौरान वाराणसी में भी ऐसे ही आईपी एड्रेस की पहचान की गई, जिनके जरिए चाइल्ड पोर्नोग्राफी सर्च या डाउनलोड की जा रही थी। इस पर वाराणसी के साइबर थाने में सुसंगत धाराओं में मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है।
गलती से भी फोन में न रखें ऐसी सामग्री
साइबर विशेषज्ञों और पुलिस अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि भारतीय कानून (IT Act और POCSO Act) के तहत बच्चों से संबंधित किसी भी अश्लील सामग्री को देखना, डाउनलोड करना, दूसरों को भेजना (Share) या अपने डिवाइस में रखना एक गंभीर और गैर-जमानती अपराध है।
साइबर पुलिस की चेतावनी
अगर कोई व्यक्ति इंटरनेट पर ऐसा कंटेंट सर्च या शेयर करता है, तो टेक कंपनियां (जैसे गूगल, मेटा, व्हाट्सएप) ऑटोमेटेड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सिस्टम के जरिए तुरंत उस अकाउंट को फ्लैग कर देती हैं। यह सूचना सीधे केंद्रीय साइबर एजेंसियों के पास पहुंचती है, जिससे आरोपी की लोकेशन और पहचान तुरंत पुलिस के पास आ जाती है।





