रक्षा में आत्मनिर्भरता की असली परीक्षा, Ex-CDS ने White Labelling के खतरे से चेताया…

Ex- CDS Gen Anil Chauhan: भारत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। देश में रक्षा उत्पादन बढ़ाने, निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स को प्रोत्साहित करने तथा विदेशी आयात पर निर्भरता घटाने के लिए कई स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन इसी बीच पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने रक्षा क्षेत्र में White Labelling की प्रवृत्ति को लेकर चिंता जताई है।

यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रक्षा क्षेत्र में किसी उत्पाद को केवल भारत में असेंबल कर देना और उसके पीछे की पूरी तकनीक भारत के पास होना एक ही बात नहीं है।

क्या है White Labelling?
White Labelling का मतलब है किसी विदेशी हथियार, ड्रोन, रडार या रक्षा प्रणाली को भारतीय कंपनी के नाम से पेश करना, जबकि उसकी मूल तकनीक, डिजाइन या महत्वपूर्ण कंपोनेंट विदेश से आते हों। रक्षा क्षेत्र में इसे अनौपचारिक तौर पर ‘स्क्रूड्राइवरगिरी’ भी कहा जाता है—यानी विदेशी सिस्टम या किट भारत में लाकर उसे असेंबल करना और फिर भारतीय उत्पाद के तौर पर पेश करना।

सिर्फ असेंबली से आत्मनिर्भरता नहीं
विशेषज्ञों के मुताबिक वास्तविक आत्मनिर्भरता का मतलब केवल भारत में किसी उत्पाद का अंतिम निर्माण नहीं है। किसी रक्षा प्रणाली की असली ताकत उसके सेंसर, प्रोसेसर, सॉफ्टवेयर, इंजन और अन्य महत्वपूर्ण तकनीकों में होती है।

अगर किसी ड्रोन का ढांचा भारत में बना है, लेकिन उसके इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट और सॉफ्टवेयर विदेश से आते हैं, तो संकट की स्थिति में भारत को विदेशी सप्लाई पर निर्भर रहना पड़ सकता है। इसलिए जरूरी है कि भारत डिजाइन, बौद्धिक संपदा और तकनीकी नियंत्रण भी अपने पास रखे।

चीनी कंपोनेंट को लेकर भी उठे सवाल
2024 में भारतीय सेना के लिए खरीदे गए कुछ घरेलू ड्रोन में चीनी इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट होने को लेकर खुफिया एजेंसियों की चेतावनी सामने आई थी। इसके बाद LAC जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में तैनाती के लिए खरीदे जा रहे कुछ लॉजिस्टिक ड्रोन को लेकर सुरक्षा संबंधी सवाल उठे।

इस घटनाक्रम ने रक्षा उपकरणों की सप्लाई चेन और कंपनियों के सेल्फ-सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया पर भी बहस छेड़ दी। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी रक्षा उत्पाद को स्वदेशी मानने से पहले उसके महत्वपूर्ण कंपोनेंट की उत्पत्ति और तकनीकी निर्भरता की जांच जरूरी है।

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विदेशी तकनीक पर निर्भरता का खतरा
पूर्वी सेना कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल आर.सी. तिवारी के मुताबिक अगर भारत महत्वपूर्ण रक्षा तकनीक में आत्मनिर्भर नहीं बनता तो युद्ध या बड़े संकट के समय विदेशी देशों की सप्लाई और राजनीतिक फैसलों पर निर्भरता बनी रह सकती है।

ग्रुप कैप्टन अजय आहलावत का भी मानना है कि आत्मनिर्भरता का आकलन केवल पैकेजिंग, वायरिंग, पेंटिंग या बाहरी ढांचे के आधार पर नहीं होना चाहिए। सेंसर, प्रोसेसर, इंजन और सॉफ्टवेयर जैसे महत्वपूर्ण हिस्सों में घरेलू क्षमता विकसित करना ज्यादा जरूरी है।

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Made in India’ से ‘Designed in India’ तक
विशेषज्ञों के मुताबिक भारत को अब केवल रक्षा उपकरणों की असेंबली से आगे बढ़कर उनकी मूल तकनीक विकसित करने पर ध्यान देना होगा। किसी सिस्टम को वास्तव में स्वदेशी तभी माना जा सकता है जब भारत उसे डिजाइन करने, उसके सॉफ्टवेयर को नियंत्रित करने, जरूरत के मुताबिक अपग्रेड करने और संकट के समय उसकी मरम्मत करने में सक्षम हो।

ऐसे में जनरल अनिल चौहान की White Labelling को लेकर चेतावनी सिर्फ रक्षा उद्योग की कार्यप्रणाली पर सवाल नहीं है, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की वास्तविक परिभाषा को लेकर भी एक महत्वपूर्ण बहस है। आखिरकार किसी हथियार पर भारतीय कंपनी का नाम होना पर्याप्त नहीं है—उसकी तकनीक, डिजाइन और नियंत्रण भी भारत के हाथ में होना चाहिए।

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