हलछठ पर पढ़ें संतान सुरक्षा और समृद्धि से जुड़ी पौराणिक कथाएं

Hal Sashti Vrat Katha: भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि यानी हलछठ (हरछठ/ललही छठ) का व्रत पूरे उत्तर भारत में माताओं द्वारा अपनी संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है। हमारी लोक संस्कृति में दूज पर दो, चौथ पर चार और हलछठ पर छः व्रत कथाएं सुनने की परंपरा है।

संख्यात्मक समानता के साथ-साथ इन 6 कथाओं का मुख्य उद्देश्य संतान की मंगल कामना, सत्य की विजय और प्रकृति संरक्षण का संदेश देना है। आइए पढ़ते हैं हलछठ व्रत की छः पौराणिक कहानियां:

1. राजा और तालाब की बलि

एक राजा ने जनहित के लिए तालाब खुदवाया, लेकिन उसमें पानी नहीं रुकता था। ज्योतिषियों ने बताया कि यदि हरछठ के दिन किसी बालक की बलि दी जाए, तो तालाब पानी से भर जाएगा। राजा ने प्रजा के प्रति दया भाव रखते हुए अपने ही पौत्र को बलि के लिए चुना और बहू को उसके पिता की बीमारी का बहाना बनाकर मायके भेज दिया।

बहू जब रास्ते में पहुंची, तो उसने हरछठ के उत्सव के बाजे बजते सुने। उसने सोचा कि यदि पिता बीमार होते तो बाजे न बजते। वह तुरंत वापस लौटी। तालाब के पास पहुंचकर उसने देखा कि तालाब पानी से लबालब भरा है और उसका पुत्र कमल के पत्तों के बीच खेल रहा है। हलछठ माता की कृपा से बालक जीवित था। राजा-रानी ने अपनी भूल स्वीकार कर बहू से क्षमा मांगी और पूरा परिवार खुशी-खुशी रहने लगा।

2. गोहुंआ बछड़े और ठेंगुरिया-मोगरिया की कहानी

एक घर में सीधी सास और चंचल दिमाग की बहू रहती थी। उनके घर में ‘गोहुंआ’ नाम का बछड़ा था और पड़ोस की दासी के बच्चों का नाम ‘ठेंगुरिया’ और ‘मोगरिया’ था। एक दिन सास ने बहू से कहा कि “अनाज (गेहूं) पका लेना और लकड़ी (ठेंगुरिया-मोगरिया) जला देना।”

अधबैली बहू ने शब्दों को गलत समझकर बछड़े को काट कर पकने चढ़ा दिया और दासी के बच्चों को चूल्हे में लगा दिया। जब सास लौटी और यह सब देखा, तो वह रोने लगी। लेकिन हलछठ माता के प्रताप से जब गाय वापस आई और उसने घूरे को सींग से खोदा, तो बछड़ा सही-सलामत बाहर निकल आया और दासी के बच्चे भी घूरे पर खेलते हुए मिल गए। सबने हलछठ माता की महिमा को प्रणाम किया।

3. खीरे-ककड़ी से बालक बनने का चमत्कार

क ग्वालिन एक दिन सिर पर दही रख कर बेचने शहर जा रही थी। मार्ग में एक खीरे-ककड़ी की बाड़ी मिली। बाड़ी वाला बोला, ‘ग्वालिन! मेरे खीरे और ककड़ी भी लेती जाओ।’ ग्वालिन सोच में पड़ गयी कि ‘दोनों चीजे कैसे ले जाऊं, दही बेचूंगी या खीरा-ककड़ी। पर अंत में उसने ले लिये। रास्ते में एक खेत मिला, जहां एक किसान हल चला रहा था। ग्वालिन ने किसान से कहा, ‘भैया मेरे खीरे-ककड़ी का ध्यान रखना, मैं दही बेचकर आती हूं फिर इनको ले जाऊंगी।’ किसान राजी हो गया, ग्वालिन उधर गयी इधर सब खीरे-ककड़ी लड़के बन गये।

सब टोकरी से निकल कर किसान को घेर लिया। किसान का हल जोतना मुश्किल हो गया। कोई आगे आ जाता, कोई बगल में, कोई पीछे। किसान घबराया कि कहीं कोई हल के नीचे ना आ जाये। उसने हल जोतना बंद कर बैल खोल दिये और सभी बच्चों को एकत्र कर बैठ गया। थोड़ी देर में जब ग्वालिन लौटी तब किसान ने कहा, ‘वाह! कैसे खीरे-ककड़ी तुम रख गयी थी, ये तो सब बालक बन गए, सम्भालो अपने बालकों को। ‘इतने सारे बच्चे पाकर ग्वालिन बड़ी प्रसन्न हुयी, लड़कों को लेकर नाचती-गाती चली गई।

“जोता खांव ना जोता रौदौं।
आज मेरे हर दौं दौं दौं दौं।।”

हलछठ माई के प्रताप से निःसंतान को संतान मिली, इसीलिए इस दिन जोता-बोया खाया नहीं जाता है।

4. सास-बहू और बेजुबान पशुओं की सेवा

एक घर में सास पशुओं से बहुत प्रेम करती थी, लेकिन बहू ने गंदगी देखकर सभी गाय, भैंस और बछड़ों को डंडे मारकर घर से भगा दिया। शाम को जब सास आई तो उसने माथा पीट लिया और कहा कि यह पशु ही हमारे जीवन का आधार हैं।

गलती का अहसास होने पर दोनों सास-बहू पशुओं को खोजने जंगल गईं। उन्होंने बहुत मनुहार की और वादा किया कि अब उन्हें कोई नहीं सताएगा। इसके बाद वे पशुओं को वापस ले आईं। यह कथा सिखाती है कि हलछठ का व्रत बेजुबान पशुओं के संरक्षण और सम्मान का संदेश देता है।

5. मां और बेटे का मोह

एक मां का इकलौता बेटा शादी के बाद ससुराल में ही बस गया और मां को भूल गया। बहुरा चौथ और हलछठ पर मां बेटे से मिलने को तरसती रही। हलछठ का पर्व फिर आ रहा था तो वह कुत्ते का वेश बनाकर स्वयं बेटे की ससुराल गयी। वहां बहू-बेटे के बीच बात हो रही थी। बेटा कह रहा था कि, ‘इस बार मैं हलछठ को मां के पास जाऊंगा, वो बहुत बेचैन होगी। ‘बहू ने कहा, अगर जाओगे तो वो तुम्हें वापस आने से रोकेगी कि इतने समय ससुराल में रहे अब यहां रहो। तो कैसे आओगे।’

बेटे ने कहा,
“मैं कोई बहाना बनाकर वापस आ जाऊंगा।” तब बहू ने उसे एक योजना बताई। उसने कहा,
“हलछठ के दिन तुम्हारी मां अच्छे लहंगा-ओढ़नी पहनकर पूजा कर रही होगी। तुम गंदे और धूल से सने हुए वहां जाना। अगर वह तुम्हें अपनी गोद में न बैठाए तो तुरंत लौट आना। खिलौने मांगना, अगर न दे तो लौट आना। फिर कलम-दवात और किताब मांगना। यदि वह न दे तो वापस आ जाना। ऊख, महुआ, खीरा, नींबू, छः प्रकार का चबेना और मीठी पूरी मांगना। अगर इनमें से कुछ भी न मिले तो लौट आना।”

बहू ने आगे कहा,
“और जब वापस आना तो हमारे लिए रतन-तरकुला और काम-सेन्दुर जरूर लेते आना।”

मां ने यह सारी बातचीत सुन ली। वह चुपचाप अपने घर लौट आई और बेटे द्वारा मांगी जाने वाली हर चीज पहले से जुटाने लगी।तैयार होकर पूजा करने लगी, तभी धूल से सना बेटा आया। मां ने उसे बहुत प्यार किया और सब चीजें मांगने पर दी। लड़का सोचने लगा मां कितनी अच्छी है सब जुटा कर रखा है। उसने सोचा कि अब वह मां की सेवा करेगा। वह वही रुक गया।

कुछ दिन बाद मां ने रतन-तरकुला और काम-सेन्दुर देकर कहा कि, ‘इसे बहू को दे देना।’ उसने पूछा कि तुम्हें कैसे पता तब मां ने पूरी बात बतायी। बेटे को स्वार्थी व्यवहार पर बहुत पछतावा हुआ। वह ससुराल गया और पत्नी को समझाकर ले आया। दोनों मिलकर मां की सेवा करने लगे हलछठ माता के प्रताप से परिवार सुखी हो गया।

6. ग्वालिन का सत्य 

एक ग्वालिन ने हलछठ के दिन अनजाने में गाय और भैंस का मिला-जुला दूध-दही बेच दिया। जब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ, तो वह तुरंत गांव के सभी घरों में गई और अपना अपराध स्वीकार करते हुए प्रायश्चित किया।

उधर, उसका बालक खेत की मेड़ पर खेल रहा था, जो अपने मामा के हल के फाल से घायल होकर मर गया था। लेकिन ग्वालिन द्वारा सत्य बोलने और गांव वालों द्वारा क्षमा कर दिए जाने के कारण हलछठ मैया ने चमत्कार किया। जब ग्वालिन खेत पर पहुंची, तो उसका बेटा मेड़ पर खेलता हुआ मिला। सत्य और प्रायश्चित के बल पर बालक को नया जीवन मिला।

ये छह कहानियां हमारी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन लोक कथाओं का मूल भाव संतान की सुरक्षा, सत्य बोलना, जीव-दया, प्रकृति का संरक्षण और हल से जुते अनाज का सम्मान करना है।

Back to top button