UP में ‘लंपी’ की दस्तक: गोवंश को बचाने के लिए पशुपालक तुरंत करें ये काम…

Lumpy Virus: आगरा में गोवंशीय मवेशियों में लंपी त्वचा रोग के मामले बढ़ने से पशुपालकों की चिंता बढ़ गई है। जानिए लंपी वायरस के लक्षण, संक्रमण फैलने के कारण और पशुओं को सुरक्षित रखने के जरूरी उपाय।

Agra: उत्तर प्रदेश के आगरा में गोवंशीय मवेशियों में लंपी त्वचा रोग (Lumpy Skin Disease) के मामले सामने आने के बाद पशुपालकों में चिंता बढ़ गई है। यह एक विषाणुजनित बीमारी है, जो खासतौर पर गाय और अन्य गोवंशीय पशुओं को प्रभावित करती है। बीमारी के बढ़ते मामलों को देखते हुए पशुपालन विशेषज्ञों ने संक्रमित पशुओं को तत्काल स्वस्थ पशुओं से अलग रखने और बचाव के लिए जरूरी सावधानियां बरतने की सलाह दी है।

कैसे फैलता है लंपी वायरस?
कृषि विज्ञान केंद्र बिचपुरी के पशुपालन विशेषज्ञ धर्वेंद्र सिंह चौहान के अनुसार, लंपी स्किन डिजीज वायरस मुख्य रूप से मच्छर, मक्खी, चिंचड़ और जूं जैसे रक्त चूसने वाले कीटों के जरिए एक पशु से दूसरे पशु तक फैल सकता है। संक्रमित मवेशियों के सीधे संपर्क में आने से भी संक्रमण का खतरा रहता है।

इसके अलावा संक्रमित पशुओं के सीमेन, प्लेसेंटा तथा दूषित पानी और आहार से भी संक्रमण फैलने की आशंका हो सकती है। ऐसे में पशुपालकों के लिए पशुशाला की साफ-सफाई और संक्रमित पशुओं को अलग रखना बेहद महत्वपूर्ण है।

लंपी रोग के प्रमुख लक्षण क्या हैं?
लंपी बीमारी की पहचान कुछ खास लक्षणों से की जा सकती है। संक्रमित पशु में सामान्य तौर पर:

  • तेज बुखार
  • आंख और नाक से पानी आना
  • सिर और गर्दन पर कठोर गांठें
  • जननांगों के आसपास गांठ और सूजन
  • कमजोरी और सुस्ती
  • वजन कम होना
  • दूध उत्पादन में गिरावट
  • लंगड़ापन

जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
गंभीर मामलों में गांठों में घाव बन सकते हैं। पशु को सांस लेने में परेशानी और निमोनिया जैसी जटिलताएं भी हो सकती हैं। ऐसे लक्षण नजर आने पर पशुपालक को बिना देरी किए पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।

संक्रमित पशु को तुरंत करें अलग
विशेषज्ञों की सलाह है कि जिस पशु में लंपी रोग के लक्षण दिखाई दें, उसे तुरंत स्वस्थ पशुओं से अलग कर दिया जाए। बीमार पशु के लिए चारा और पानी की अलग व्यवस्था करनी चाहिए। साथ ही उसके अनावश्यक आवागमन पर रोक लगानी चाहिए, ताकि संक्रमण दूसरे पशुओं तक न पहुंचे।

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पशुशाला की साफ-सफाई बेहद जरूरी
लंपी से बचाव के लिए पशुशाला को साफ और सूखा रखना जरूरी है। नियमित रूप से पशुशाला की सफाई और विसंक्रमण करना चाहिए। साथ ही मच्छर, मक्खी और चिंचड़ जैसे रक्त चूसने वाले कीटों पर नियंत्रण के उपाय किए जाने चाहिए।

पशुपालकों को नए खरीदे गए या बाहर से आने वाले मवेशियों को भी सीधे झुंड में शामिल नहीं करना चाहिए। ऐसे पशुओं को कुछ समय तक अलग रखकर उनकी निगरानी करने की सलाह दी गई है।

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स्वस्थ मवेशियों के टीकाकरण पर जोर
लंपी बीमारी से बचाव के लिए स्वस्थ पशुओं का टीकाकरण भी महत्वपूर्ण माना जाता है। पशुपालकों को अपने क्षेत्र के पशु चिकित्सा विभाग या पशु चिकित्सक से संपर्क कर टीकाकरण और बीमारी की रोकथाम से जुड़ी सलाह लेनी चाहिए।

लंपी के मामलों को देखते हुए पशुपालकों के लिए सबसे जरूरी बात यही है कि बीमारी के शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करें। संक्रमित पशु को अलग रखने, साफ-सफाई बनाए रखने, कीट नियंत्रण करने और विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार टीकाकरण कराने से संक्रमण के प्रसार को रोकने में मदद मिल सकती है।

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