
अयोध्या-काशी के बाद अब लोधेश्वर! योगी का 200 करोड़ का मास्टरप्लान, 2027 पर नजर…
UP Politics 2027: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले योगी आदित्यनाथ सरकार ने धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ सियासी समीकरणों पर भी बड़ा दांव खेल दिया है। बाराबंकी के लोधेश्वर महादेव मंदिर को करीब 200 करोड़ रुपये की लागत से भव्य कॉरिडोर के रूप में विकसित किया जा रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 20 जुलाई को इस परियोजना की आधारशिला रखने जा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में धार्मिक स्थलों का विकास अब सिर्फ आस्था का विषय नहीं रह गया है। अयोध्या, काशी और महाकुंभ के बाद योगी सरकार का फोकस अब बाराबंकी के लोधेश्वर महादेव मंदिर पर है। सरकार का लक्ष्य है कि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले कॉरिडोर का निर्माण पूरा कर इसका उद्घाटन भी कर दिया जाए।
यही वजह है कि लोधेश्वर कॉरिडोर को यूपी की चुनावी राजनीति में एक बड़े प्रोजेक्ट के तौर पर देखा जा रहा है।
200 करोड़ रुपये से बनेगा लोधेश्वर कॉरिडोर
लोधेश्वर महादेव मंदिर के आसपास करीब 20 बीघा यानी लगभग 5.4 लाख वर्ग फुट क्षेत्र में विकास कार्य किया जा रहा है। इस पूरी परियोजना पर करीब 200 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
कॉरिडोर के लिए मंदिर के आसपास मौजूद 127 घरों और दुकानों को हटाया गया है। प्रशासन के मुताबिक, वैध दस्तावेज रखने वाले प्रभावित लोगों को करीब 48 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया गया है। वहीं, अवैध कब्जों के खिलाफ कार्रवाई की गई।
परियोजना के तहत भव्य प्रवेश द्वार, परिक्रमा पथ, विश्राम गृह, क्लॉक रूम, आधुनिक शौचालय और पार्किंग जैसी सुविधाएं विकसित की जाएंगी। इसके अलावा अमृत सरोवर के सौंदर्यीकरण पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
अयोध्या और काशी मॉडल की अगली कड़ी?
बीजेपी सरकार अयोध्या में राम मंदिर और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर को अपनी सांस्कृतिक विकास नीति की बड़ी उपलब्धियों के तौर पर पेश करती रही है।
अब लोधेश्वर कॉरिडोर को इसी मॉडल की अगली कड़ी माना जा रहा है। सरकार की कोशिश है कि धार्मिक स्थलों को बेहतर सुविधाओं और बुनियादी ढांचे से जोड़कर उन्हें बड़े पर्यटन केंद्रों में बदला जाए।
सरकार का दावा है कि लोधेश्वर कॉरिडोर बनने के बाद बाराबंकी में धार्मिक पर्यटन को नई रफ्तार मिलेगी।
लोधेश्वर से जुड़े हैं कई पिछड़े समुदाय
लोधेश्वर महादेव मंदिर की सबसे बड़ी राजनीतिक अहमियत इसकी सामाजिक और धार्मिक पहुंच को लेकर मानी जा रही है।
लोध, गुर्जर, तोमर, पाल और कई अन्य पिछड़े समुदायों के बीच भगवान शिव को कुलदेवता के रूप में मानने की परंपरा है। सावन और महाशिवरात्रि के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषक इसे सिर्फ मंदिर विकास की परियोजना नहीं मान रहे हैं। उनके मुताबिक, लोधेश्वर कॉरिडोर के जरिए बीजेपी धार्मिक आस्था के साथ-साथ पिछड़े वर्गों तक अपनी पहुंच को भी मजबूत करने की कोशिश कर सकती है।
अखिलेश के PDA के सामने BJP का नया सियासी फॉर्मूला?
समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव की PDA रणनीति यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण ने बीजेपी के सामने बड़ी राजनीतिक चुनौती पेश की है।
ऐसे में बीजेपी लगातार पिछड़े वर्गों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है। लोधेश्वर कॉरिडोर को इसी बड़े राजनीतिक संदर्भ में देखा जा रहा है।
हालांकि, बीजेपी इसे सीधे तौर पर चुनावी रणनीति नहीं बता रही है। पार्टी का कहना है कि यह परियोजना धार्मिक विरासत के संरक्षण और क्षेत्रीय विकास से जुड़ी है।
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लाखों श्रद्धालुओं को मिलेगा फायदा
बाराबंकी के अलावा उन्नाव, बांदा, जालौन, कानपुर, हमीरपुर और कालपी जैसे इलाकों से भी श्रद्धालु लोधेश्वर महादेव मंदिर पहुंचते हैं।
सरकार का दावा है कि कॉरिडोर बनने के बाद श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी। इसके साथ ही स्थानीय व्यापार, होटल और परिवहन क्षेत्र को भी फायदा होगा।
सरकार के मुताबिक, धार्मिक पर्यटन बढ़ने से स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
विपक्ष बोला- चुनाव से पहले धार्मिक परियोजनाओं पर जोर
विपक्ष ने लोधेश्वर कॉरिडोर के समय को लेकर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का कहना है कि 2027 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले धार्मिक परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाना बीजेपी की चुनावी रणनीति का हिस्सा है।
आलोचकों का आरोप है कि सरकार धार्मिक भावनाओं को चुनावी राजनीति से जोड़ रही है।
वहीं, बीजेपी का कहना है कि धार्मिक स्थलों का विकास प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत और पर्यटन नीति का हिस्सा है। पार्टी का दावा है कि इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को फायदा होगा।
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अब निर्माण की रफ्तार पर टिकी नजर
लोधेश्वर कॉरिडोर की आधारशिला रखे जाने के बाद सबसे बड़ा सवाल इसके निर्माण की रफ्तार को लेकर होगा। सरकार की कोशिश है कि 2027 चुनाव से पहले परियोजना पूरी हो जाए। अगर ऐसा होता है, तो बीजेपी इसे धार्मिक पर्यटन और क्षेत्रीय विकास की बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश कर सकती है।
लोधेश्वर कॉरिडोर आस्था, विकास और राजनीति—तीनों का संगम बनता दिख रहा है। अब देखना होगा कि 2027 से पहले योगी सरकार का यह धार्मिक दांव सिर्फ पर्यटन परियोजना साबित होता है या फिर PDA की राजनीति के सामने बीजेपी का नया सियासी मास्टरस्ट्रोक बनकर उभरता है।
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