
UP News: शादी का वादा कर सहमति से संबंध बनाना दुष्कर्म नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Allahabad High Court Verdict: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि शादी का वादा कर लंबे समय तक बने सहमति से संबंध को दुष्कर्म नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने मुरादाबाद कोर्ट के समन आदेश को रद्द कर दिया है।
Allahabad High Court Verdict : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल विवाह का वादा करके लंबे समय तक बनाए गए सहमति आधारित (Consensual) संबंधों को हर मामले में दुष्कर्म (Rape) की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने साफ किया कि यदि आरोपी की मंशा शुरुआत से ही धोखा देने की नहीं थी, तो बाद में शादी से इनकार करने को ‘झूठे वादे पर दुष्कर्म’ नहीं माना जाएगा।
क्या था पूरा मामला?
पीड़ित महिला ने आरोप लगाया था कि इंस्टाग्राम (Instagram) पर संपर्क होने के बाद आरोपी कपिल सोम ने उसे शादी का झांसा दिया और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। महिला का आरोप था कि बाद में आरोपी और उसके परिवार ने उसके साथ मारपीट की, जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर अपमानित किया और उसका आर्थिक शोषण भी किया। इसके अलावा, महिला ने आरोपी के पिता पर भी दुष्कर्म का गंभीर आरोप लगाया था। इस शिकायत के आधार पर वर्ष 2025 में मुरादाबाद में एससी/एसटी एक्ट और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां:
1. शादी का टूटना और झूठा वादा दोनों अलग स्थितियां: उच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ‘शादी का झूठा वादा करना’ और ‘शादी का बाद में टूट जाना’ दो पूरी तरह से अलग परिस्थितियां हैं। दुष्कर्म का अपराध केवल तभी बनता है जब यह अकाट्य रूप से साबित हो जाए कि आरोपी की मंशा शुरू से ही शादी करने की नहीं थी और उसने केवल शारीरिक संबंध बनाने के मकसद से झूठा जाल बुना था।
2. बालिग और शिक्षित थी महिला: अदालत ने पाया कि महिला 24 वर्ष की एक बालिग और शिक्षित युवती है। वह अपनी मर्जी से आरोपी के संपर्क में आई थी, उसके साथ मेरठ गई और लंबे समय तक दोनों पति-पत्नी की तरह साथ रहे। रिकॉर्ड्स और सबूतों को देखते हुए कोर्ट ने माना कि यह रिश्ता पूरी तरह से आपसी सहमति पर आधारित था और पहली नजर में यह कहीं से भी नहीं लगता कि आरोपी की नीयत शुरुआत से ही धोखा देने की थी।
3. न्याय व्यवस्था पर बढ़ेगा अनावश्यक बोझ: न्यायमूर्ति ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि लंबे समय तक बिना किसी विरोध के चलने वाले संबंधों के टूटने पर यदि बाद में ऐसे आपराधिक आरोप लगाए जाते हैं, तो इससे हर असफल प्रेम संबंध (Failed Love Relationship) एक आपराधिक मुकदमे में तब्दील हो जाएगा। ऐसा होने से देश की न्याय व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ बढ़ेगा। हर असफल रिश्ते को दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता।
4. इस मामले में लागू नहीं होगी बीएनएस (BNS) की धारा 69: अदालत ने एक और महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु स्पष्ट करते हुए कहा कि इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 (जो शादी का झूठा वादा कर संबंध बनाने से संबंधित है) लागू नहीं की जा सकती। क्योंकि कथित घटनाएं वर्ष 2022-23 की हैं, जबकि नया कानून (BNS) 1 जुलाई 2024 से लागू हुआ है। कानून का प्रभाव पूर्वव्यापी (Retrospective) नहीं हो सकता।
5. SC/ST एक्ट के तहत भी नहीं बनता मामला: जातिसूचक टिप्पणी और अपमान के आरोपों पर हाईकोर्ट ने कहा कि एफआईआर (FIR) और दर्ज बयानों में सार्वजनिक रूप से अपमानित करने का कोई स्पष्ट साक्ष्य या आरोप नहीं है। महज जाति का उल्लेख कर शादी से मना कर देना एससी/एसटी एक्ट की धाराओं को आकर्षित नहीं करता।
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अदालत का अंतिम फैसला
इन सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में मुकदमे की कार्यवाही को आगे जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का सरासर दुरुपयोग होगा। इसके साथ ही कोर्ट ने निचले न्यायालय द्वारा 5 जुलाई 2025 को जारी समन आदेश और संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर आरोपी को बड़ी राहत दी।
न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकल पीठ ने यह फैसला आरोपी कपिल सोम और एक अन्य व्यक्ति द्वारा दायर की गई आपराधिक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया। हाईकोर्ट ने मुरादाबाद की विशेष एससी/एसटी (SC/ST) अदालत द्वारा जारी किए गए संज्ञान और समन आदेश को पूरी तरह खारिज करते हुए मामले की पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया।
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