
ममता को बड़ा झटका! बागी सांसदों की सूची में शामिल हुईं सयानी घोष…
West Bengal News: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद पार्टी के भीतर असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है। पहले विधायक दल में बिखराव और अब संसदीय दल में संभावित टूट की खबरों ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इसी बीच जादवपुर से सांसद और बंगाली अभिनेत्री सयानी घोष का नाम भी उन 20 सांसदों की सूची में शामिल बताया जा रहा है, जिन्होंने लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखकर संसद में अलग बैठने की व्यवस्था और एनडीए को समर्थन देने की इच्छा जताई है।
राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम को ममता बनर्जी और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है। क्योंकि सयानी घोष केवल सांसद ही नहीं, बल्कि पार्टी की युवा और लोकप्रिय चेहरों में से एक मानी जाती रही हैं।
स्पीकर को भेजे गए पत्र से बढ़ी हलचल
सूत्रों के अनुसार, टीएमसी के 20 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को एक पत्र भेजकर संसद में अलग पहचान और बैठने की व्यवस्था की मांग की है। दावा किया जा रहा है कि इस पत्र में सयानी घोष के भी हस्ताक्षर हैं। यदि यह घटनाक्रम आधिकारिक रूप से पुष्ट होता है, तो यह टीएमसी के संसदीय दल में अब तक की सबसे बड़ी राजनीतिक टूट साबित हो सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि इतने बड़े समूह ने पार्टी लाइन से अलग रास्ता चुना है, तो इसका असर केवल संसद तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति पर भी गहरा प्रभाव पड़ सकता है।
कौन हैं सयानी घोष?
सयानी घोष बंगाली फिल्म और टेलीविजन जगत का जाना-पहचाना नाम हैं। अभिनय और गायन के क्षेत्र में पहचान बनाने के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा और तृणमूल कांग्रेस से जुड़ गईं। पार्टी ने उन्हें युवा नेतृत्व के रूप में आगे बढ़ाया और वे लगातार संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय रहीं।
लोकसभा चुनाव में उन्होंने जादवपुर सीट से जीत हासिल कर संसद में प्रवेश किया। उनकी छवि एक मुखर और आक्रामक नेता की रही है, जो अक्सर विपक्षी दलों पर तीखे हमले करती रही हैं।
‘काबा-मदीना’ गाने को लेकर हुई थीं चर्चित
सयानी घोष उस समय राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आई थीं, जब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने एक गीत गाया था, जिसकी पंक्तियां थीं— “मेरे दिल में है काबा और आंखों में मदीना।” यह गीत सोशल मीडिया और राजनीतिक मंचों पर काफी चर्चित रहा था। समर्थकों ने इसे सांस्कृतिक अभिव्यक्ति बताया, जबकि विरोधियों ने इसे चुनावी ध्रुवीकरण से जोड़कर सवाल उठाए थे।
इस विवाद के बावजूद सयानी घोष पार्टी के प्रमुख प्रचार चेहरों में बनी रहीं और ममता बनर्जी के करीबी नेताओं में उनकी गिनती होती रही।
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ममता बनर्जी के लिए क्यों अहम है यह झटका?
टीएमसी लंबे समय से ममता बनर्जी के नेतृत्व में बंगाल की राजनीति में मजबूत स्थिति बनाए हुए थी। लेकिन हालिया चुनावी झटकों के बाद पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ने की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। पहले कुछ विधायकों के असंतुष्ट होने की चर्चाएं हुईं और अब सांसदों के स्तर पर भी अलग रुख अपनाने की खबरों ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पार्टी के लोकप्रिय चेहरे और युवा सांसद भी अलग रास्ता चुनते हैं, तो इससे टीएमसी की संगठनात्मक एकता और राजनीतिक प्रभाव दोनों पर असर पड़ सकता है।
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बंगाल से दिल्ली तक बढ़ी राजनीतिक सरगर्मी
सयानी घोष का नाम सामने आने के बाद बंगाल से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। विपक्षी दल इसे टीएमसी के कमजोर होते जनाधार और संगठनात्मक संकट का संकेत बता रहे हैं, जबकि पार्टी की ओर से अभी तक इस पूरे मामले पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
हालांकि राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह केवल असंतुष्ट सांसदों का दबाव बनाने का प्रयास है या फिर वास्तव में तृणमूल कांग्रेस के भीतर बड़े स्तर पर राजनीतिक पुनर्संरेखण की शुरुआत हो चुकी है। फिलहाल इतना तय है कि सयानी घोष का नाम इस विवाद में सामने आने से ममता बनर्जी की राजनीतिक चुनौतियां और बढ़ गई हैं।
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