
‘पिता की पहचान बेटे का अधिकार’, DNA टेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला…
Suprime Court Decision: पितृत्व (Paternity) से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति का रेप केस में बरी हो जाना यह साबित नहीं करता कि वह बच्चे का जैविक पिता नहीं हो सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि पितृत्व विवाद का समाधान करने के लिए DNA जांच आवश्यक हो, तो कोर्ट उसका आदेश दे सकती है।
सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने यह फैसला उस मामले में दिया, जिसमें एक युवक ने दावा किया था कि वह एक व्यक्ति का जैविक पुत्र है और उसे अपने पिता की पहचान तथा संपत्ति में अधिकार पाने का हक है। कथित पिता ने DNA टेस्ट कराने का विरोध करते हुए निजता (Privacy) के अधिकार का हवाला दिया था।
बेटे के अधिकार को दी प्राथमिकता
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि इस मामले में एक तरफ व्यक्ति का निजता का अधिकार है, जबकि दूसरी ओर एक युवक का यह जानने का अधिकार है कि उसका जैविक पिता कौन है। अदालत ने माना कि अपनी पहचान और वंशावली के बारे में जानना किसी व्यक्ति के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है और कई परिस्थितियों में यह अधिकार निजता के अधिकार से अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।
पीठ ने कहा कि जब पितृत्व ही विवाद का मुख्य मुद्दा हो और उपलब्ध अन्य साक्ष्य इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर देने में सक्षम न हों, तब वैज्ञानिक जांच यानी DNA टेस्ट सबसे विश्वसनीय माध्यम बन जाता है। ऐसे मामलों में अदालत सच्चाई तक पहुंचने के लिए DNA जांच का आदेश दे सकती है।
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Rape केस में बरी होने का क्या असर?
मामले की पृष्ठभूमि में यह तथ्य भी था कि संबंधित व्यक्ति के खिलाफ पहले दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज हुआ था, जिसमें वह बरी हो गया था। उसने दलील दी कि बरी होने के बाद पितृत्व का दावा नहीं किया जा सकता। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि आपराधिक मुकदमे में बरी होना और जैविक पितृत्व का प्रश्न दो अलग-अलग मुद्दे हैं। इसलिए केवल बरी होने के आधार पर DNA जांच से बचा नहीं जा सकता।
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कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि DNA टेस्ट का निर्देश कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं है और इसे हर मामले में नहीं दिया जा सकता। लेकिन जहां पितृत्व विवाद का समाधान अन्य साक्ष्यों से संभव न हो और न्याय के हित में वैज्ञानिक जांच आवश्यक हो, वहां अदालत ऐसा आदेश देने के लिए पूरी तरह सक्षम है।
अदालत ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति की जैविक पहचान जानने का अधिकार उसके व्यक्तित्व, सम्मान और कानूनी अधिकारों से जुड़ा हुआ है। ऐसे में न्यायालय को दोनों पक्षों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाकर फैसला करना होता है।
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