‘शराब-सिगरेट पर अतिरिक्त टैक्स लगाइए, लेकिन बेटियों को…’, CJI सूर्यकांत की कड़ी फटकार

महिला वकीलों के लिए अदालतों में सुविधाओं की कमी पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाई है. सर्वोच्च न्यायालय ने कहा 'अदालतों में ऐसा वातावरण बनाया जाए, जिसमें महिला वकील अपनी जिम्मेदारियों को सुरक्षित और बराबरी के आधार पर निभा सके.'

देशभर की जिला और तालुका अदालतों (Subordinate Courts) में महिला वकीलों और वादियों के लिए बुनियादी सुविधाओं, खासकर टॉयलेट और वॉशरूम की भारी कमी पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI Surya Kant) जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने राज्यों द्वारा फंड की कमी का बहाना बनाने पर कड़ी फटकार लगाई।

“शराब-सिगरेट पर अतिरिक्त टैक्स लगाइए”

सुनवाई के दौरान जब यह बात सामने आई कि कर्नाटक सहित कई राज्यों की तालुका अदालतों में महिला वकीलों के लिए अलग या चालू हालत में वॉशरूम तक नहीं हैं, तो सीजेआई काफी भावुक और नाराज नजर आए। उन्होंने अदालतों में काम करने वाली महिलाओं की दयनीय स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा:

“जरा देखिए हमारी बेटियों और बहनों के काम करने की स्थिति कितनी खराब है, वे किन परिस्थितियों में काम करने को मजबूर हैं। यह कहना कि हमारे पास फंड नहीं है या राज्य राजस्व घाटे (Revenue Deficit) में है, बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं होगा। अगर आपके पास पैसों की कमी है, तो शराब या सिगरेट पर अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (Extra Excise Tax) लगा दीजिए, हम (सुप्रीम कोर्ट) उसे कानूनी रूप से सही ठहराएंगे।”

PWD को दिए सख्त निर्देश

जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहाना की तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले में केवल मौखिक टिप्पणी ही नहीं की, बल्कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए एक सख्त समय-सीमा (Timeline) भी तय कर दी है:

  • 2 सप्ताह में ग्राउंड रिपोर्ट: सभी राज्यों के एडवोकेट जनरल (AG) को निर्देश दिया गया है कि वे अगले दो हफ्तों के भीतर अपने-अपने राज्यों की हाई कोर्ट, जिला अदालतों और तालुका अदालतों में महिलाओं के वॉशरूम की जमीनी हकीकत का पता लगाकर रिपोर्ट पेश करें।

  • 4 सप्ताह में निर्माण शुरू: रिपोर्ट सौंपे जाने के ठीक 4 हफ्ते के भीतर लोक निर्माण विभाग (PWD) को उन सभी जगहों पर बुनियादी सुविधाओं से लैस वॉशरूम का निर्माण कार्य अनिवार्य रूप से शुरू करना होगा, जहां इसकी कमी है।

  • 6 सप्ताह में स्टेटस रिपोर्ट: सभी राज्य सरकारों को कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए 6 सप्ताह के भीतर अपनी कंप्लायंस (अनुपालन) और स्टेटस रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करनी होगी।

गरिमा के साथ काम करना अनुच्छेद 21 का हिस्सा

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि महिला वकीलों को अपनी पेशेवर जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा कोर्ट परिसरों में बिताना पड़ता है। ऐसे में उनके लिए सुरक्षा, गोपनीयता और स्वच्छता की सुविधाएं प्रदान करना संविधान के अनुच्छेद 21 (Right to Life and Dignity) के तहत उनके मौलिक अधिकार से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। कोर्ट ने साफ चेतावनी दी है कि इस तय समय-सीमा में किसी भी तरह की ढिलाई या लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

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