जौहर यूनिवर्सिटी पर बुलडोजर से पहले जानिए, कौन थे मौलाना मोहम्मद अली जौहर?

Who Is Maulana Mohammad Ali Jauhar: उत्तर प्रदेश के रामपुर में समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री आजम खान द्वारा स्थापित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी एक बार फिर चर्चा में है। यूनिवर्सिटी के नाम को लेकर अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर मौलाना मोहम्मद अली जौहर कौन थे, जिनके नाम पर रामपुर में इतनी बड़ी यूनिवर्सिटी बनाई गई।

मौलाना मोहम्मद अली जौहर स्वतंत्रता आंदोलन के दौर के प्रमुख नेताओं में शामिल थे। वे पत्रकार, लेखक, स्वतंत्रता सेनानी और खिलाफत आंदोलन के प्रमुख चेहरों में से एक थे। उनका जीवन भारतीय राजनीति, पत्रकारिता और आजादी की लड़ाई से गहराई से जुड़ा रहा।

10 दिसंबर 1878 को रामपुर में हुआ था जन्म
मौलाना मोहम्मद अली जौहर का जन्म 10 दिसंबर 1878 को रामपुर में हुआ था। वे शेख अब्दुल अली खान के परिवार में जन्मे और उनकी मां का नाम आबादी बानो बेगम था, जिन्हें इतिहास में ‘बी अम्मा’ के नाम से जाना जाता है।

उनके पिता का निधन कम उम्र में ही हो गया था। इसके बावजूद उनकी मां ने अपने बच्चों की शिक्षा पर खास जोर दिया। मोहम्मद अली जौहर ने शुरुआती शिक्षा के बाद अलीगढ़ के एमएओ कॉलेज में पढ़ाई की और बाद में उच्च शिक्षा के लिए ऑक्सफोर्ड गए। उन्होंने आधुनिक इतिहास में एमए किया।

पत्रकारिता को बनाया अंग्रेजों के खिलाफ हथियार
मौलाना मोहम्मद अली जौहर सिर्फ राजनेता नहीं थे, बल्कि एक प्रभावशाली पत्रकार भी थे। उन्होंने अंग्रेजी भाषा का अखबार ‘कॉमरेड’ शुरू किया। इसके जरिए वे ब्रिटिश नीतियों और औपनिवेशिक शासन की आलोचना करते थे।

इसके बाद उन्होंने उर्दू अखबार ‘हमदर्द’ भी शुरू किया। उनकी पत्रकारिता में राष्ट्रवाद, राजनीतिक जागरूकता और अंग्रेजी शासन के विरोध की स्पष्ट झलक दिखाई देती थी।

उनके लेखों और विचारों से ब्रिटिश सरकार असहज रहती थी। यही वजह थी कि उनके अखबारों पर कार्रवाई हुई और उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा।

मुस्लिम लीग के अध्यक्ष भी रहे मोहम्मद अली जौहर
मोहम्मद अली जौहर ने 1906 में मुस्लिम लीग से जुड़कर अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की। 1917 में उन्हें मुस्लिम लीग का अध्यक्ष चुना गया।

हालांकि बाद में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से भी जुड़े। 1919 में उन्होंने कांग्रेस में सक्रिय भूमिका निभाई और 1923 में कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने। यह उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण दौर था।

मौलाना जौहर महात्मा गांधी के साथ भी जुड़े और खिलाफत आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल रहे। वे ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाते रहे।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना में अहम भूमिका
मौलाना मोहम्मद अली जौहर का शिक्षा के क्षेत्र में भी बड़ा योगदान रहा। उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1920 में अलीगढ़ में जामिया मिल्लिया इस्लामिया की शुरुआत हुई, जिसे बाद में दिल्ली स्थानांतरित किया गया। आज यह देश की प्रमुख केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शामिल है।

शिक्षा को लेकर मौलाना जौहर का मानना था कि समाज को मजबूत बनाने के लिए ज्ञान और आधुनिक शिक्षा बेहद जरूरी है। यही सोच उनके जीवन और राजनीतिक विचारों में भी दिखाई देती थी।

लंदन में दिया था ऐतिहासिक बयान
1930 में मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लिया। उस समय उनका स्वास्थ्य खराब था, लेकिन इसके बावजूद वे सम्मेलन में पहुंचे।

इसी दौरान उन्होंने भारत की आजादी को लेकर एक बेहद चर्चित बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि “या तो मुझे आजादी दो या मेरी कब्र के लिए दो गज जमीन दे दो, मैं गुलाम देश में वापस नहीं जाना चाहता।”

उनका यह बयान आज भी उनके स्वतंत्रता संघर्ष और दृढ़ राजनीतिक विचारों की पहचान माना जाता है।

लंदन में हुआ निधन, यरुशलम में हुए सुपुर्द-ए-खाक
मौलाना मोहम्मद अली जौहर का निधन 4 जनवरी 1931 को लंदन में हुआ। उनकी अंतिम इच्छा थी कि उन्हें यरुशलम में दफनाया जाए।

उनकी इच्छा के अनुसार, उनके पार्थिव शरीर को यरुशलम ले जाया गया और 23 जनवरी 1931 को बैतुल मुकद्दस यानी यरुशलम में सुपुर्द-ए-खाक किया गया।

इस तरह रामपुर से शुरू हुआ उनका जीवन सफर लंदन होते हुए यरुशलम तक पहुंचा।

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आजम खान ने क्यों रखा यूनिवर्सिटी का नाम?
मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर रामपुर में मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की स्थापना की गई। यूनिवर्सिटी की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इसका नाम उनके सम्मान में रखा गया और इसे शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को श्रद्धांजलि के तौर पर देखा जाता है। यूनिवर्सिटी की स्थापना उत्तर प्रदेश विधानमंडल के अधिनियम के तहत हुई और 2012 में इसकी शैक्षणिक गतिविधियां शुरू हुईं।

आजम खान लंबे समय से इस यूनिवर्सिटी से जुड़े रहे हैं और इसे अपने बड़े सपनों में से एक बताते रहे हैं। हालांकि यूनिवर्सिटी को लेकर आजम खान और उनके परिवार को लगातार राजनीतिक और कानूनी विवादों का सामना करना पड़ा है।

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यूनिवर्सिटी को लेकर फिर चर्चा में आजम खान
हाल ही में रामपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी ने यूनिवर्सिटी की 38 इमारतों को लेकर ध्वस्तीकरण आदेश जारी किया है। प्राधिकरण का कहना है कि इन इमारतों के निर्माण के लिए आवश्यक स्वीकृत बिल्डिंग प्लान नहीं थे। इस कार्रवाई के बाद यूनिवर्सिटी और आजम खान एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में हैं।

लेकिन इन तमाम विवादों के बीच यह सवाल भी चर्चा में है कि आखिर उस व्यक्ति का इतिहास क्या था, जिसके नाम पर आजम खान ने यूनिवर्सिटी बनाई।

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