
Karwa Chauth: सबसे पहले किसने रखा था करवा चौथ का व्रत? जानें संपूर्ण कथा और पूजन विधि
Karwa Chauth Vrat Katha: सुहागिन महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य, प्रेम और समर्पण का प्रतीक पर्व करवा चौथ सनातन संस्कृति में बेहद खास माना जाता है। इस दिन सुहागिनें अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और उज्जवल भविष्य के लिए सूर्योदय से लेकर चंद्रदर्शन तक निर्जला व्रत रखती हैं। इस व्रत की महिमा और परंपरा सदियों से चली आ रही है, जो आपसी प्रेम और अटूट रिश्ते को मजबूत करती है।
सबसे पहले किसने रखा था करवा चौथ का व्रत?
पौराणिक मान्यताओं और कथाओं के अनुसार, करवा चौथ का व्रत सबसे पहले जगत जननी माता पार्वती ने भगवान शिव के लिए रखा था। इसके अलावा विभिन्न धार्मिक कथाओं में कई अन्य प्रसंग भी मिलते हैं। माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने और उनके अखंड सौभाग्य के लिए यह निर्जला व्रत सबसे पहले किया था।
एक अन्य प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार, पृथ्वी पर सबसे पहले राजा वीरसन की पत्नी रानी वीरवती ने अपने भाइयों के द्वारा छल से व्रत टूटने के बाद, माता पार्वती के बताए अनुसार दोबारा विधि-विधान से यह व्रत रखा था, जिसके प्रभाव से उनके पति जीवित हो गए थे।
महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण की सलाह पर पांडवों की रक्षा और उनके संकटों को दूर करने के लिए महारानी द्रौपदी ने भी करवा चौथ का व्रत रखा था। इसके अलावा करवा नाम की एक पतिव्रता स्त्री ने अपने पति के प्राण मगरमच्छ से बचाने के लिए अपने तप और सतीत्व के बल पर यमराज से संघर्ष किया था, जिसके बाद से उनके नाम पर इस व्रत की परंपरा जुड़ी।
करवा चौथ व्रत के नियम
सुहागिन महिलाओं के लिए यह व्रत बहुत ही अनुशासन और निष्ठा के साथ पूरा किया जाता है। व्रत की शुरुआत ब्रह्म मुहूर्त में सूर्योदय से ठीक पहले यानी करीब चार से पांच बजे के बीच सास द्वारा दी जाने वाली सरगी खाकर होती है। सरगी में फल, मिठाई, मेवे, फेनी और सुहाग की वस्तुएं शामिल होती हैं। सरगी ग्रहण करने के बाद जल पीकर पूरे दिन निर्जला व्रत रखने का संकल्प लिया जाता है। दिन के समय या शाम की पूजा से पहले महिलाएं नए वस्त्र पहनती हैं, हाथों में मेहंदी रचाती हैं और पूरी तरह सोलह श्रृंगार करती हैं।
शाम की पूजा की सामग्री
शाम के समय पूजा के लिए मिट्टी का ढक्कन सहित करवा, करवा चौथ माता यानी माता पार्वती, शिव जी, गणेश जी और कार्तिकेय जी की तस्वीर या कैलेंडर, लाल वस्त्र, कलश, आम या अशोक के पत्ते, दीपक, रुई, रोली, चंदन, हल्दी, अक्षत यानी चावल, फूल, कलावा, सिंदूर, मिठाई, फल, छलनी और पूजा की पुस्तक की आवश्यकता होती है। पूजा की शुरुआत में एक साफ लकड़ी की चौकी पर लाल रंग का नया वस्त्र बिछाकर उस पर करवा चौथ माता का चित्र स्थापित किया जाता है।
पूजन विधि
पूजा के दौरान एक मिट्टी या तांबे के कलश में जल, गंगाजल, सिक्का, सुपारी, हल्दी की गांठ और अक्षत डाले जाते हैं। कलश के कंठ पर मौली बांधकर स्वास्तिक बनाया जाता है। इसके ऊपर आम के पांच पत्ते और उसके ऊपर चावल या गेहूं से भरी प्लेट रखकर दीपक या नारियल रखा जाता है। इसके बाद हाथ में पुष्प और अक्षत लेकर अपने पति की लंबी उम्र और अखंड सौभाग्य की कामना करते हुए व्रत का संकल्प लिया जाता है।
गणेश जी, शिव-पार्वती और करवा माता को रोली, अक्षत, फूल, कलावा और चुनरी अर्पित की जाती है। करवे पर रोली से तेरह बिंदियां लगाकर उसकी विधि-विधान से पूजा की जाती है। माता को भोग लगाने के बाद बैठकर श्रद्धापूर्वक कथा सुनी जाती है और अंत में करवे को दोनों हाथों से फेरकर प्रणाम किया जाता है।
चंद्रमा को अर्घ्य और व्रत का पारण
रात के समय जब चंद्रमा निकलता है, तब छलनी में दीपक रखकर पहले चांद का दीदार किया जाता है। इसके बाद चंद्रमा को जल से अर्घ्य दिया जाता है। चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद उसी छलनी से अपने पति का चेहरा देखा जाता है। अंत में पति के हाथों से जल पीकर और मिठाई खाकर व्रत संपन्न किया जाता है।
सात भाइयों की प्रसिद्ध व्रत कथा
करवा चौथ की कथाओं में वीरावती और सात भाइयों की कथा सबसे प्रमुख मानी जाती है। एक साहूकार के सात पुत्रों की इकलौती बहन वीरावती ने अपने सुखी वैवाहिक जीवन और पति की लंबी उम्र के लिए पहली बार करवा चौथ का निर्जला व्रत रखा था। वीरावती को भूख-प्यास से व्याकुल देखकर उसके सात भाइयों से रहा नहीं गया। भाइयों ने मिलकर दूर पहाड़ी की ओट में पीपल के पेड़ के पीछे एक छलनी की आड़ में दीपक इस तरह जलाया कि वह दूर से चंद्रमा जैसा दिखाई दे। भाइयों ने वीरावती से कहा कि चंद्रमा निकल आया है।
वीरावती ने उसे चंद्रमा समझकर अर्घ्य दिया और भोजन कर लिया। भोजन का पहला कौर खाते ही उसे अपने पति की मृत्यु का अशुभ समाचार मिल गया। वीरावती के इस संकट को देखकर देवी पार्वती प्रकट हुईं और उसे अपनी भूल का अहसास कराया। वीरावती ने पूरे विधि-विधान, नियम और निष्ठा के साथ अगले करवा चौथ तक साल भर की सभी चौथ का व्रत रखा। उसकी तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर देवी ने उसके पति को पुनर्जीवित कर दिया।





