
सरकारी योजना का लाभ लेने पर घिरे कृषि राज्यमंत्री, कहा- मैं पहले किसान हूं…
Agricultural Subsidy: केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्यमंत्री भागीरथ चौधरी को अपने ही मंत्रालय की एक सरकारी योजना के तहत करीब ₹99 लाख की सब्सिडी मिलने के बाद देशभर में राजनीतिक बहस छिड़ गई है।
विपक्षी दलों ने इसे हितों के टकराव (कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) का मामला बताते हुए सरकार को घेरना शुरू कर दिया है, वहीं मंत्री ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि उन्होंने एक किसान के तौर पर नियमों का पालन करते हुए योजना का लाभ लिया है।
खीरे की खेती के लिए मिली सब्सिडी
जानकारी के मुताबिक, भागीरथ चौधरी ने आधुनिक तकनीक आधारित संरक्षित खेती (प्रोटेक्टेड कल्टीवेशन) के तहत खीरे की खेती का एक बड़ा प्रोजेक्ट शुरू किया है। यह परियोजना करीब 16,592 वर्गमीटर क्षेत्र में स्थापित की जा रही है, जिसके लिए उन्हें सरकार की योजना के अंतर्गत लगभग ₹99 लाख की सब्सिडी स्वीकृत हुई है।
यह सब्सिडी कृषि क्षेत्र में नई तकनीकों को बढ़ावा देने और किसानों को उच्च मूल्य वाली फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से दी जाती है। योजना के तहत पात्र किसान निर्धारित शर्तों को पूरा करने पर वित्तीय सहायता प्राप्त कर सकते हैं।
मंत्री ने कहा- मैंने कुछ भी छिपाया नहीं
मामले के तूल पकड़ने के बाद भागीरथ चौधरी ने सार्वजनिक रूप से अपनी सफाई पेश की। उन्होंने कहा कि वे राजनीति में आने से पहले से ही किसान रहे हैं और आज भी खेती से जुड़े हुए हैं।
उन्होंने कहा, “मैं किसान हूं और एक किसान के रूप में मुझे जो अधिकार सरकारी योजनाओं के तहत प्राप्त हैं, उनका मैंने उपयोग किया है। मैंने कोई नियम नहीं तोड़ा है और न ही कोई जानकारी छिपाई है। पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से पूरी हुई है।”
मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि परियोजना को स्थापित करने के लिए उन्होंने बैंक से लगभग ₹2 करोड़ का ऋण लिया है। उनके मुताबिक, यह निवेश आधुनिक कृषि तकनीक अपनाने और किसानों के लिए एक मॉडल फार्म विकसित करने के उद्देश्य से किया गया है।
नई तकनीक से खेती करना चाहते हैं मंत्री
भागीरथ चौधरी का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल आर्थिक लाभ कमाना नहीं, बल्कि नई कृषि तकनीकों को अपनाकर किसानों को प्रेरित करना है। उन्होंने कहा कि संरक्षित खेती, ड्रिप सिंचाई और नियंत्रित वातावरण में खेती जैसी तकनीकों से कम पानी और कम संसाधनों में अधिक उत्पादन संभव है।
उन्होंने कहा कि यदि जनप्रतिनिधि स्वयं नई तकनीक अपनाएंगे तो किसानों में भी आधुनिक खेती को लेकर विश्वास बढ़ेगा और वे परंपरागत खेती से आगे बढ़कर उच्च आय वाली फसलों की ओर रुख करेंगे।
विपक्ष ने उठाए नैतिकता से जुड़े सवाल
हालांकि विपक्षी दलों और कुछ किसान संगठनों ने इस मामले में नैतिकता का सवाल उठाया है। उनका कहना है कि जिस मंत्रालय की योजनाओं का संचालन कोई मंत्री कर रहा हो, उसी मंत्रालय की योजना का लाभ उसे मिलने से हितों के टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है।
विपक्ष का तर्क है कि भले ही मंत्री ने नियमों के तहत आवेदन किया हो, लेकिन सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और नैतिकता के उच्च मानकों का पालन भी उतना ही जरूरी है।
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समर्थकों का तर्क- पात्रता है तो लाभ लेने का अधिकार भी
दूसरी ओर, मंत्री के समर्थकों का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति सभी पात्रता मानदंडों को पूरा करता है तो केवल मंत्री होने के कारण उसे सरकारी योजना से वंचित नहीं किया जा सकता।
उनका मानना है कि भागीरथ चौधरी ने बैंक ऋण लेकर बड़े पैमाने पर निवेश किया है और यदि उनकी परियोजना सफल होती है तो यह क्षेत्र के किसानों के लिए एक उदाहरण बन सकती है।
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कानूनी नहीं, नैतिक बहस का विषय बना मामला
फिलहाल इस मामले में किसी प्रकार के नियम उल्लंघन या अनियमितता का आरोप साबित नहीं हुआ है। लेकिन यह विवाद अब कानूनी से ज्यादा नैतिक और राजनीतिक बहस का विषय बन चुका है।
एक तरफ मंत्री यह दावा कर रहे हैं कि उन्होंने एक किसान के रूप में अपने अधिकारों का उपयोग किया है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष सवाल उठा रहा है कि क्या सत्ता और सरकारी पद पर बैठे लोगों को उन योजनाओं का लाभ लेना चाहिए, जिनकी नीतियां और संचालन स्वयं उनके मंत्रालय के हाथ में हो।
आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद से लेकर राजनीतिक मंचों तक चर्चा का केंद्र बना रह सकता है, क्योंकि यह केवल एक सब्सिडी का मामला नहीं बल्कि सरकारी योजनाओं, पारदर्शिता और सार्वजनिक पदों की जवाबदेही से जुड़ा बड़ा सवाल बन गया है।
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