सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से मचा बवाल, क्या बदलेंगी मंदिर परंपराएं?

Supreme Court Hearing: नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान सबरीमाला मामले ने एक बार फिर देशभर में बहस को तेज कर दिया है। नौ जजों की संविधान पीठ के सामने सुनवाई के दौरान जस्टिस B. V. Nagarathna ने महिलाओं के साथ होने वाले व्यवहार पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की, जिसने इस विवाद को नई दिशा दे दी है।

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि किसी महिला को हर महीने तीन दिन तक ‘अछूत’ मानना और चौथे दिन उसे सामान्य मान लेना तार्किक नहीं है। उन्होंने यह टिप्पणी महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़ी सामाजिक धारणाओं के संदर्भ में की।

उन्होंने साफ कहा कि इस तरह का व्यवहार संविधान के मूल सिद्धांतों—विशेष रूप से समानता और गरिमा—के अनुरूप नहीं है।

क्या है पूरा सबरीमाला विवाद?
Sabarimala Temple में परंपरागत रूप से 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध रहा है। साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रतिबंध को हटाते हुए महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी। अदालत ने तब कहा था कि यह रोक लैंगिक भेदभाव है।

हालांकि इस फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं, जिन पर अब भी सुनवाई जारी है।

केंद्र सरकार का पक्ष
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta ने 2018 के फैसले की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी पर आपत्ति जताई।

उन्होंने कहा कि महिलाओं के प्रवेश पर रोक को ‘अछूत प्रथा’ (अनुच्छेद 17) से जोड़ना सही नहीं है। उनका तर्क था कि यह मामला धार्मिक परंपरा और विशेष प्रथाओं से जुड़ा है, जिसे अलग दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।

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संविधान बनाम परंपरा: बहस का केंद्र
यह मामला अब केवल मंदिर प्रवेश का नहीं रह गया है, बल्कि यह बड़े संवैधानिक सवालों से जुड़ गया है—

  • क्या धार्मिक परंपराएं महिलाओं के अधिकारों से ऊपर हो सकती हैं?
  • क्या मासिक धर्म से जुड़ी धारणाएं भेदभाव की श्रेणी में आती हैं?
  • क्या अदालतें धार्मिक प्रथाओं की समीक्षा कर सकती हैं?

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि यदि किसी सामाजिक बुराई को धार्मिक प्रथा का रूप दे दिया जाए, तो अदालत उसे जांच सकती है।

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क्यों महत्वपूर्ण है यह टिप्पणी?
जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी इस पूरे मामले में एक अहम मोड़ मानी जा रही है। यह न सिर्फ सबरीमाला विवाद बल्कि देशभर में महिलाओं के अधिकारों और धार्मिक प्रथाओं के बीच संतुलन की बहस को प्रभावित कर सकती है।

Supreme Court of India में चल रही यह सुनवाई आने वाले समय में एक ऐतिहासिक फैसला दे सकती है, जो यह तय करेगा कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और लैंगिक समानता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा।

फिलहाल इतना साफ है कि कोर्ट की यह टिप्पणी समाज में जड़ जमा चुकी धारणाओं पर गंभीर सवाल खड़े करती है और महिलाओं के अधिकारों की बहस को नई दिशा देती है।

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