
नवरात्रि में कैसे करें मां दुर्गा की पूजा? जानें कुंकुमार्चन और आंचल भरने के नियम
Shardiya Navratri 2026: शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ 11 अक्टूबर से है। पहले दिन कलश स्थापना के साथ दुर्गा पूजा शुरू होती है। सनातन धर्म में श्री दुर्गा देवी को आदिशक्ति के रूप में पूजनीय माना गया है। नवरात्रि सहित विभिन्न धार्मिक अवसरों पर भक्त देवी मां की उपासना कर सुख, शांति, शक्ति और कल्याण की प्रार्थना करते हैं।
सनातन संस्था के संजय कुमार सिंह के अनुसार, यदि भक्तों को देवी की पूजा-विधि और उनके प्रिय उपचारों का ज्ञान हो, तो उपासना के प्रति श्रद्धा और भक्ति-भाव कई गुना बढ़ जाता है। आइए जानते हैं मां दुर्गा और उनके विभिन्न स्वरूपों की उपासना से जुड़े महत्वपूर्ण आध्यात्मिक नियम और सही पूजा-विधि:
देवी को हल्दी-कुमकुम अर्पित करने का नियम
देवी के किसी भी रूप की पूजा करते समय उन्हें अनामिका अंगुली (करंगली के पास वाली अंगुली) से चंदन लगाना चाहिए। देवी को हल्दी-कुमकुम अर्पित करते समय पहले हल्दी और फिर कुमकुम दाएं हाथ के अंगूठे और अनामिका की चिमटी में लेकर देवी के चरणों में चढ़ाएं। इस मुद्रा से साधक के शरीर का अनाहत चक्र जागृत होता है और भक्ति-भाव में वृद्धि होती है।
देवी के विभिन्न स्वरूपों के प्रिय पुष्प
विशिष्ट देवी को उनकी प्रिय गंध वाले पुष्प अर्पित करने से उनका शक्तितत्व शीघ्र आकृष्ट होता है। पुष्प हमेशा 9 या 9 के गुणांक (18, 27 आदि) में वर्तुलाकार में अर्पित करने चाहिए, जिसका मध्य भाग रिक्त रहे:
-
श्री दुर्गा देवी: मोगरा
-
श्री लक्ष्मी देवी: कमल, गेंदे का फूल
-
श्री भवानी देवी: भूमिकमल
-
श्री रेणुका देवी: बकुल
-
श्री सप्तशृंगी देवी: कवठी चंपा
-
श्री योगेश्वरी देवी: सोनचाफा (नोट: देवी को मोगरे का इत्र और मोगरा, केवड़ा, चंपा, चमेली या चंदन की गंध वाली अगरबत्ती अर्पित करना शुभ होता है।)
अगरबत्ती से आरती और परिक्रमा की विधि
भक्ति के शुरुआती चरण (द्वैत अवस्था) में दो अगरबत्तियों से और अद्वैत भाव की ओर बढ़ते हुए एक अगरबत्ती से आरती करनी चाहिए। अगरबत्ती को दाएं हाथ की तर्जनी और अंगूठे से पकड़कर घड़ी की सुई की दिशा (Clockwise) में तीन बार घुमाना चाहिए। देवी की परिक्रमा हमेशा विषम संख्या (1, 3, 5, 7) में करनी चाहिए और प्रत्येक परिक्रमा के बाद देवी को प्रणाम करना चाहिए।
कुंकुमार्चन का महत्व
देवी की नामजप करते हुए एक-एक चुटकी कुमकुम (सिंदूर) चरणों से लेकर मस्तक तक अर्पित करना या कुमकुम से स्नान कराना ‘कुंकुमार्चन’ कहलाता है। कुमकुम शक्ति का प्रतीक है, जो देवी के शक्तितत्व को ग्रहण करता है। इस कुमकुम को माथे पर लगाने से भक्त को देवी की दिव्य शक्ति प्राप्त होती है।
देवी का आंचल कैसे भरें?
देवी का आंचल लाल रंग के सूती या रेशमी वस्त्र/साड़ी से भरना चाहिए। 9 गज की साड़ी (नौवारी) दुर्गा जी के 9 रूपों का प्रतीक मानी जाती है।
थाली में साड़ी रखकर उस पर नारियल रखें। दोनों हाथों से नारियल की शिखा देवी की ओर रखते हुए, छाती के सामने खड़े होकर भावपूर्वक प्रार्थना करें और इसे चरणों में अर्पित करें।
पूजा के उपरांत देवी के चरणों में अर्पित वस्त्र और नारियल को प्रसाद स्वरूप धारण व ग्रहण करें। इससे शरीर के चारों ओर सुरक्षा कवच बनता है।




