अब समय पर मिलेगा न्याय! सुप्रीम कोर्ट ने रिजर्व फैसलों को लेकर जारी किए नए नियम…

Supreme Court: देश की न्यायिक व्यवस्था में लंबित फैसलों और लगातार बढ़ती देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक और सख्त रुख अपनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को देशभर के सभी हाईकोर्ट्स को निर्देश दिया कि किसी भी मामले में फैसला सुरक्षित रखने के बाद उसे अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाना अनिवार्य होगा। यदि तय समयसीमा में फैसला नहीं सुनाया जाता, तो मामला संबंधित हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के संज्ञान में लाया जाएगा और जरूरत पड़ने पर केस दूसरी बेंच को ट्रांसफर कर दिया जाएगा।

भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए यह महत्वपूर्ण आदेश जारी किया। कोर्ट ने कहा कि न्याय में अनावश्यक देरी से आम जनता का न्यायपालिका पर भरोसा प्रभावित होता है और इसे रोकना समय की मांग है।

फैसलों में देरी पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता
सुप्रीम Court ने अपने आदेश में कहा कि कई मामलों में सुनवाई पूरी होने के बाद फैसले महीनों तक सुरक्षित रखे जाते हैं। इससे न केवल पक्षकारों को मानसिक और आर्थिक परेशानी होती है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की गति भी प्रभावित होती है।

अदालत ने कहा कि न्यायिक संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए समयबद्ध फैसले बेहद जरूरी हैं। कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि कई बार फैसले सुनाए जाने के बाद उन्हें वेबसाइट पर अपलोड करने में भी लंबा समय लगा दिया जाता है।

क्या हैं सुप्रीम कोर्ट के नए निर्देश?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार—

रिजर्व किए गए फैसले 3 महीने के भीतर सुनाना अनिवार्य होगा।
यदि तीन महीने में फैसला नहीं आता, तो संबंधित हाईकोर्ट का रजिस्ट्रार जनरल मामला मुख्य न्यायाधीश के सामने रखेगा।
मुख्य न्यायाधीश विशेष परिस्थितियों में अधिकतम दो सप्ताह का अतिरिक्त समय दे सकते हैं।
तय अतिरिक्त समय के बाद भी फैसला लंबित रहने पर मामला दूसरी बेंच को ट्रांसफर किया जा सकता है।
फैसलों को समय पर ऑनलाइन अपलोड करने पर भी जोर दिया गया है।

अनुच्छेद 142 के तहत दिया गया आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत दिया है, जो अदालत को पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए विशेष अधिकार प्रदान करता है। अदालत ने कहा कि यह निर्देश न्यायिक प्रशासन में सुधार और लंबित मामलों को कम करने के उद्देश्य से जारी किए गए हैं।

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लाखों मुकदमेबाजों को राहत की उम्मीद
देशभर की अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं और बड़ी संख्या में ऐसे केस हैं जिनमें सुनवाई पूरी होने के बावजूद फैसले सुरक्षित रखे गए हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश लाखों मुकदमेबाजों के लिए राहत भरा माना जा रहा है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से न्यायिक जवाबदेही बढ़ेगी और अदालतों में मामलों के निपटारे की गति तेज हो सकती है। साथ ही इससे ‘तारीख पर तारीख’ की धारणा पर भी काफी हद तक रोक लगेगी।

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न्यायपालिका में पारदर्शिता बढ़ाने की कोशिश
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि तकनीक के इस दौर में अदालतों को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना जरूरी है। फैसलों की कॉपी समय पर वेबसाइट पर उपलब्ध कराने से वकीलों, पक्षकारों और आम लोगों को काफी सुविधा मिलेगी।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय न्यायिक इतिहास में एक बड़े सुधारात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है, जो आने वाले समय में अदालतों की कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव ला सकता है।

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