
‘संविधान हत्या दिवस’ की घोषणा पर उठे सवाल: राजनीतिक लाभ या संवैधानिक गरिमा पर प्रहार?
Samvidhan Hatya Diwas: क्या मोदी सरकार द्वारा 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ घोषित करना संवैधानिक है? जानिए अनुच्छेद 352, आपातकाल के इतिहास और इसके पीछे की राजनीति पर वरिष्ठ पत्रकार डॉ. जयशंकर प्रसाद शुक्ल का विश्लेषण।
भारतीय लोकतंत्र में विमर्श और विवादों का चोली-दामन का साथ रहा है। लोकसभा चुनाव 2024 के परिणामों और चुनावी कैंपेन के दौरान विपक्ष द्वारा ‘संविधान बचाने’ की मुहिम ने सत्तापक्ष को गहरे तक प्रभावित किया। इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि के बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने 25 जून को आधिकारिक तौर पर “संविधान हत्या दिवस” के रूप में मनाने की घोषणा की।
इस घोषणा पर राजनीतिक और कानूनी हलकों में एक नया विवाद छिड़ गया है। सवाल यह उठता है कि जब भारत के संविधान में ही आपातकाल (इमरजेंसी) लगाने का स्पष्ट प्रावधान मौजूद है, तो इस संवैधानिक कदम को ‘हत्या’ की संज्ञा देना कितना न्यायसंगत और संवैधानिक है?
संवैधानिक प्रक्रिया या असंवैधानिक कदम?
इतिहास के पन्नों को पलटें तो 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू किया था। हालांकि, यह निर्णय किसी बंद कमरे की तानाशाही नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक पूरी संवैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया था।
तत्कालीन प्रधानमंत्री ने बाकायदा कैबिनेट की बैठक बुलाई और अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल लगाने का प्रस्ताव पारित किया। इस कैबिनेट प्रस्ताव से तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को अवगत कराया गया, जिसके बाद उन्होंने इसकी आधिकारिक उद्घोषणा की। इसके विपरीत, वर्तमान सरकार का यह नैरेटिव कि इंदिरा गांधी ने व्यक्तिगत तौर पर संविधान को ताक पर रखकर यह फैसला लिया, ऐतिहासिक तथ्यों से परे नजर आता है।
देश में अब तक कब-कब लगा आपातकाल?
भारतीय इतिहास में अब तक कुल तीन बार राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) लगाया जा चुका है:
| क्रम संख्या | अवधि | कारण | तत्कालीन नेतृत्व |
| 1 | 26 अक्टूबर 1962 – 10 जनवरी 1968 | भारत-चीन युद्ध (बाहरी आक्रमण) | जवाहरलाल नेहरू |
| 2 | 3 दिसंबर 1971 – 17 दिसंबर 1971 | भारत-पाकिस्तान युद्ध | इंदिरा गांधी |
| 3 | 25 जून 1975 – 21 मार्च 1977 | आंतरिक अशांति एवं सुरक्षा खतरा | इंदिरा गांधी |
मोदी सरकार ने केवल तीसरे आपातकाल को ही ‘संविधान की हत्या’ माना है, जो इसके पीछे की विशुद्ध राजनीतिक मंशा और चुनावी हार की खीझ को उजागर करता है।
‘संविधान की हत्या’ शब्द पर गंभीर आपत्ति
“संविधान कोई नश्वर जीव नहीं है जिसकी हत्या की जा सके। यह राष्ट्र की आत्मा और सर्वोच्च मार्गदर्शिका है।” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद इसी संविधान की शपथ लेकर गुजरात के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री के रूप में देश की कमान संभाली है। यदि संविधान की ‘हत्या’ हो चुकी है, तो फिर उसी मृत व्यवस्था की शपथ लेकर शासन चलाना एक विरोधाभास पैदा करता है।
अनुच्छेद 356 और 360 की प्रासंगिकता
संविधान ने राष्ट्रपति को तीन प्रकार की आपातकालीन शक्तियां दी हैं:
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राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352): युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह की स्थिति में।
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राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356): राज्यों में संवैधानिक तंत्र विफल होने पर। (इसका दुरुपयोग करते हुए विपक्षी सरकारों को गिराने का काम लगभग हर दौर की केंद्र सरकारों ने किया है, जिसमें वर्तमान मोदी सरकार भी शामिल है।)
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वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360): देश की आर्थिक स्थिरता खतरे में होने पर। (भारत में यह कभी नहीं लगा। 1991 के आर्थिक संकट से तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने देश को उबारा था।)
विमर्श या केवल राजनीति?
1975 के आपातकाल की परिस्थितियां असाधारण थीं। उस वक्त विपक्ष द्वारा सेना और पुलिस को सरकार के आदेश न मानने के आह्वान किए जा रहे थे, जिससे देश की आंतरिक सुरक्षा और संप्रभुता खतरे में थी। आपातकाल निश्चित रूप से एक कड़वी घटना थी, लेकिन तत्कालीन विपक्ष की अराजकता भी उतनी ही जिम्मेदार थी।
दशकों बाद इस पर हो रहा विमर्श केवल राजनीतिक नफरत और वोटबैंक को साधने का जरिया मात्र है। प्रधानमंत्री द्वारा ‘संविधान हत्या दिवस’ जैसी शब्दावली का प्रयोग करना खुद संविधान के अनुच्छेद 352 की अवहेलना और एक असंवैधानिक सोच का परिचायक है। लोकतंत्र में संस्थाओं और नियमों का सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए, न कि तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए संवैधानिक प्रावधानों को ‘हत्या’ का नाम दिया जाना चाहिए।
लेखक: डॉ. जयशंकर प्रसाद शुक्ल (वरिष्ठ पत्रकार)





