जानें ‘सात शीतला बहनें’ लोक परंपरा और बासौड़ा का महत्व

Shardiya Navratri 2026: सनातन धर्म में शक्ति की उपासना का महापर्व शारदीय नवरात्रि (Shardiya Navratri 2026) इस वर्ष 11 अक्टूबर 2026, शनिवार से आरंभ हो रहा है और इसका समापन 19 अक्टूबर को होगा। इस बार अष्टमी और नवमी तिथि एक ही दिन यानी 19 अक्टूबर को मनाई जाएगी, जबकि विजयादशमी (दशहरा) का पर्व 20 अक्टूबर 2026 को मनाया जाएगा।

नवरात्रि के इस पावन पर्व पर मां दुर्गा के साथ-साथ हमारी समृद्ध लोक संस्कृति में पूजी जाने वाली देवियों और लोक परंपराओं का भी विशेष महत्व होता है। ऐसी ही एक अनूठी और गहरी लोकआस्था ‘सात शीतला बहनों’ (Sheetla Mata) की परंपरा है।

कौन हैं ‘सात शीतला बहनें’?

लोकमान्यता में माता शीतला को केवल चेचक जैसे संक्रामक रोगों से रक्षा करने वाली देवी ही नहीं, बल्कि बच्चों और पूरे परिवार की रक्षिका, शीतलता और आरोग्य की अधिष्ठात्री माना गया है। देश के विभिन्न अंचलों की लोकपरंपराओं में शीतला माता को सात बहनों के समूह की प्रमुख देवी के रूप में पूजा जाता है।

इन सात शक्तियों को अलग-अलग रोगों, ताप और उससे मुक्ति की लोकधारणाओं से जोड़ा गया है। महाराष्ट्र के नागपुर क्षेत्र की एक लोक-अध्ययन परंपरा में भी शीतला की छह बहनों और एक भाई का उल्लेख मिलता है, जहाँ इन शक्तियों को विभिन्न प्रकार के चेचक से प्रतीकात्मक रूप से जोड़ा गया है।

उत्तर भारतीय लोकपरंपरा में सात बहनों के प्रचलित नाम:

एक प्रचलित उत्तर भारतीय लोकपरंपरा में इन सात बहनों के नाम इस प्रकार बताए जाते हैं:

  • ऋणिका

  • घृर्णिका

  • महला

  • मंगला

  • शीतला

  • सेठला

  • दुर्गा

(नोट: ये नाम पूरी तरह क्षेत्रीय परंपराओं पर आधारित हैं, इसलिए इन्हें सर्वमान्य नहीं कहा जा सकता।)

माता शीतला का दिव्य स्वरूप

शीतला माता का प्रसिद्ध स्वरूप अत्यंत प्रतीकात्मक है। वे गधे पर विराजमान, हाथ में झाड़ू, कलश और कई चित्रणों में सूप धारण किए दिखाई देती हैं। झाड़ू को शुद्धता और रोग-दोष दूर करने का प्रतीक तथा कलश को शीतल जल और आरोग्य का प्रतीक माना जाता है।

शीतला परंपरा से जुड़ा सबसे प्रसिद्ध पर्व शीतला अष्टमी (बासौड़ा) है। इस दिन कई क्षेत्रों में चूल्हा नहीं जलाने और एक दिन पहले तैयार किए गए शीतल (बासी) भोजन का भोग लगाने की परंपरा है। इसके पीछे का मूल भाव “अग्नि की गर्मी को विराम देकर माता की शीतल शक्ति का स्मरण करना” है।

पुरानी लोककथाओं में इन बहनों को रोग और आरोग्य की दोहरी शक्ति के रूप में देखा गया है, जिनकी आराधना से बच्चों और परिवार के स्वास्थ्य की रक्षा होती है।

Back to top button