श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष: भगवान श्रीकृष्ण के जन्म को पूरे हुए 5253 वर्ष

Janmashtami 2026: भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की कालगणना को लेकर भारतीय परंपरा और प्राचीन ग्रंथों में विस्तृत विवरण मिलता है। उपलब्ध पौराणिक संदर्भों और कालगणना के आधार पर यह माना गया है कि भगवान श्रीकृष्ण को अवतार ग्रहण किए हुए 5253 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं और 5254वां वर्ष प्रारम्भ हो गया है।

भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़ी घटनाओं का वर्णन भागवतपुराण, विष्णुपुराण, ब्रह्मपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, हरिवंशपुराण, देवीभागवतपुराण, आदिपुराण, गर्गसंहिता, महाभारत और जैमिनीय महाभारत सहित अनेक प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। इन ग्रंथों में श्रीकृष्ण के जन्म और जीवन की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख तिथि, नक्षत्र, ऋतु और विभिन्न खगोलीय स्थितियों के माध्यम से किया गया है।

कब हुआ था श्रीकृष्ण का जन्म

विष्णुपुराण और ब्रह्मपुराण के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म वर्षा ऋतु में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रात्रि में हुआ था। वहीं देवीपुराण में श्रीकृष्ण के जन्म के समय भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र, वृष लग्न और अर्द्धरात्रि की वेला का उल्लेख मिलता है।

भविष्यपुराण में भी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र और अर्द्धरात्रि के समय भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का वर्णन किया गया है। हरिवंशपुराण के अनुसार उनके जन्म के समय अभिजित नक्षत्र, जयन्ती नामक रात्रि और विजय नामक मुहूर्त था।

श्रीकृष्ण की कालगणना

महाभारत और अन्य पुराणों में भगवान श्रीकृष्ण के अवतार को द्वापर और कलियुग की संधि से जोड़ा गया है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के स्वर्गारोहण के साथ ही पृथ्वी पर कलियुग का प्रारम्भ हुआ।

विष्णु पुराण, वायु पुराण, ब्रह्म पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण और भागवत पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि जिस दिन भगवान श्रीकृष्ण पृथ्वी से परमधाम गए, उसी समय कलियुग का आरम्भ हुआ।

भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर कितने वर्ष बिताए?

ब्रह्मवैवर्त महापुराण और भागवत महापुराण के आधार पर भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर 125 वर्षों से अधिक समय तक जीवन व्यतीत किया। कालगणना के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म द्वापर युग के अंतिम चरण में हुआ था और लगभग 125 वर्ष से अधिक समय तक पृथ्वी पर विभिन्न लीलाएं करने के बाद उनका स्वर्गारोहण हुआ।

कलियुग का प्रारम्भ कब हुआ?

प्राचीन भारतीय कालगणना और आर्यभट सहित कई विद्वानों की गणनाओं के आधार पर कलियुग के प्रारम्भ को लगभग 3102 ईसा पूर्व से जोड़ा जाता है।

उपलब्ध कालगणना के अनुसार 28वें चतुर्युग के कलियुग का प्रारम्भ माघ शुक्ल पूर्णिमा के दिन 18 फरवरी, 3102 ईसा पूर्व को माना गया है। इसी कालखंड को भगवान श्रीकृष्ण के स्वर्गारोहण से भी जोड़ा गया है।

इस कालगणना के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म श्रीमुख संवत्सर, भाद्रपद कृष्ण अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। दिए गए विवरण के अनुसार इसकी तिथि 21 जुलाई, बुधवार और वर्ष 3228 ईसा पूर्व निर्धारित की गई है।

इसी आधार पर श्रीकृष्ण के जन्म से ‘श्रीकृष्ण संवत्’ की गणना भी मानी गई है। वर्ष 3228 ईसा पूर्व से वर्तमान काल की गणना करने पर जन्माष्टमी के अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण के अवतार को 5253 वर्ष पूर्ण होने और 5254वां वर्ष शुरू होने का निष्कर्ष प्रस्तुत किया गया है।

श्रीकृष्ण की जीवन यात्रा

जन्म और बाल लीलाएं

  • 3228 ईसा पूर्व: मथुरा में कंस के कारागार में देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण का जन्म।
  • जन्म के बाद वसुदेव द्वारा श्रीकृष्ण को गोकुल में नंद और यशोदा के पास पहुंचाया गया।
  • बाल्यकाल में पूतना वध और शकट भंजन जैसी प्रमुख लीलाओं का उल्लेख मिलता है।
  • आगे चलकर त्रिणावर्त, बकासुर, अघासुर और अन्य असुरों का वध किया।

गोकुल और वृंदावन की लीलाएं

श्रीकृष्ण के बाल्यकाल और किशोर अवस्था की अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं में कालिय मर्दन, गोपियों के साथ रासलीला, गोवर्धन पर्वत धारण और इंद्र के गर्व का भंग शामिल है। गोवर्धन पूजा और भगवान को ‘गोविंद’ नाम मिलने का उल्लेख भी इसी कालखंड से जुड़ा हुआ है।

मथुरा में कंस वध

कालगणना के अनुसार लगभग 3218 ईसा पूर्व में भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरा पहुंचकर कंस का वध किया और उग्रसेन को पुनः मथुरा के सिंहासन पर स्थापित किया।

शिक्षा और 64 कलाओं का ज्ञान

कंस वध के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने सांदीपनि मुनि के गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त की। विवरण के अनुसार उन्होंने वेदों, शास्त्रों, युद्ध और अन्य कलाओं सहित 64 कलाओं का ज्ञान प्राप्त किया।

द्वारका की स्थापना

बाद के वर्षों में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा द्वारका नगरी की स्थापना और जरासंध सहित कई शक्तिशाली शत्रुओं से संघर्ष का वर्णन मिलता है।

रुक्मिणी विवाह और अन्य प्रमुख घटनाएं

श्रीकृष्ण की जीवन यात्रा में रुक्मिणी हरण और विवाह, नरकासुर वध, बाणासुर से युद्ध और अनेक ऐतिहासिक एवं पौराणिक घटनाओं का उल्लेख मिलता है।

महाभारत और भगवद्गीता का उपदेश

कालगणना के अनुसार महाभारत युद्ध के समय भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी बने। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में उन्होंने अर्जुन को भगवद्गीता का उपदेश दिया। यह घटना भारतीय दर्शन, धर्म और अध्यात्म की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में मानी जाती है।

भगवान श्रीकृष्ण का स्वर्गारोहण और कलियुग का आरम्भ

समयावली के अनुसार 3102 ईसा पूर्व में भगवान श्रीकृष्ण के जीवन का अंतिम चरण आया। प्रभास क्षेत्र में उनके स्वर्गारोहण के साथ ही यदुवंश के अंत और कलियुग के प्रारम्भ का उल्लेख मिलता है। दिए गए कालगणना विवरण के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने लगभग 125 वर्ष और 5 महीने की आयु के बाद पृथ्वी से प्रस्थान किया।

निष्कर्ष

भगवान श्रीकृष्ण के जन्म और जीवन की कालगणना भारतीय पुराणों, महाकाव्यों, ज्योतिषीय संदर्भों और पारंपरिक संवत प्रणालियों से जुड़ी हुई है। विभिन्न ग्रंथों में वर्णित तिथि, नक्षत्र, ऋतु और खगोलीय स्थितियों के आधार पर श्रीकृष्ण के जीवन की एक विस्तृत समयावली तैयार की गई है।

इसी परंपरागत गणना के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म 3228 ईसा पूर्व माना गया है और जन्माष्टमी के अवसर पर उनके अवतार के 5253 वर्ष पूर्ण होने के साथ 5254वां वर्ष प्रारम्भ होने की मान्यता प्रस्तुत की जाती है।

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