कथा के साथ करें भगवान विश्वकर्मा का पूजन, जाने औजारों की सुरक्षा का विधान

Vishwakarma Jayanti 2026: सृष्टि के प्रथम शिल्पकार और देवताओं के वास्तुकार भगवान विश्वकर्मा की पूजा धार्मिक और व्यावसायिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा की कृपा से कारोबार में वृद्धि, औजारों और मशीनों की सुरक्षा तथा सभी प्रकार के निर्माण कार्यों में निर्विघ्न सफलता प्राप्त होती है।

मैथिली भाषा में सरल पूजा-विधि और संस्कृत में रचित चार अध्यायों की संपूर्ण ‘विश्वकर्मा व्रत-कथा’ का यह प्रामाणिक संकलन श्रद्धालुओं और कारीगरों के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया है।

पूजा की तैयारी का विधान

विश्वकर्मा पूजा की शुरुआत शुद्ध मन और स्वच्छ वस्त्र धारण करके की जाती है। पूजा के लिए जल, गंगाजल, रोली, चंदन, फूल, माला, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, मिठाई, मौली, यज्ञोपवीत, कलश और नारियल जैसी सामग्रियां एकत्र की जाती हैं।

इसके साथ ही दूध, दही, घी, शहद और शक्कर को मिलाकर पंचामृत तैयार किया जाता है, जिसका उपयोग भगवान के पवित्र स्नान के लिए होता है। पूजा स्थल को साफ-सुथरा करके चौकी पर भगवान विश्वकर्मा का चित्र स्थापित कर कलश स्थापना की जाती है और अपने कार्यक्षेत्र के सभी औजारों, मशीनों व वाहनों की सफाई की जाती है।

आचमन, शुद्धिकरण, संकल्प और पूजन

पूजा की शुरुआत में तीन बार आचमन करके हाथ धोए जाते हैं और फिर पवित्र जल से स्वयं तथा पूजा सामग्री का प्रोक्षण किया जाता है। इसके बाद परिवार की सुख-शांति, आरोग्य, व्यवसाय में उन्नति और यंत्रों की सुरक्षा का संकल्प लिया जाता है।

विघ्नहर्ता श्री गणेश का ध्यान कर उनका पूजन संपन्न किया जाता है। इसके पश्चात कलश देवता और पञ्चदेवता यानी गणेश, सूर्य, विष्णु, शिव और शक्ति को गंध व पुष्प अर्पित कर भगवान विश्वकर्मा का आवाहन और ध्यान किया जाता है।

औजारों की प्रार्थना

भगवान विश्वकर्मा को पाद्य, अर्घ्य, स्नान, पंचामृत स्नान और वस्त्र अर्पित करने के बाद यज्ञोपवीत, चंदन, अक्षत, पुष्प, दूर्वा, तुलसीदल, धूप और दीप दिखाया जाता है। इसके बाद फल, मिठाई और ताम्बूल का भोग लगाकर यथाशक्ति दक्षिणा अर्पित की जाती है।

पूजा के सबसे विशेष चरण में कार्यक्षेत्र के सभी उपकरणों, कंप्यूटर, वाहनों और मशीनों पर चंदन व पुष्प अर्पित कर ‘ॐ विश्वकर्मणे नमः’ मंत्र के साथ उनकी सुरक्षा की विशेष प्रार्थना की जाती है। अंत में पुष्पांजलि, प्रदक्षिणा, क्षमायाचना और आरती के साथ पूजा संपन्न होती है।

श्री विश्वकर्मा व्रत-कथा का महात्म्य

पूजन के उपरांत पौराणिक संस्कृत में रचित ‘श्री विश्वकर्मा व्रत-कथा’ का पाठ किया जाता है। सूत जी और शौनक मुनियों के संवाद पर आधारित इस कथा के प्रथम अध्याय में भगवान विश्वकर्मा द्वारा इंद्रलोक, कैलाश, वैकुण्ठ, लंकापुरी और सुदर्शन चक्र जैसे दिव्य निर्माणों का वर्णन है।

द्वितीय अध्याय में धर्मदास नामक शिल्पकार की कथा है, जिसने व्यापार में नुकसान के बाद नियमपूर्वक व्रत कर पुन: समृद्धि पाई। तीसरे और चौथे अध्याय में देवताओं द्वारा विश्वकर्मा पूजन और एक उद्योगपति द्वारा अपने कारखाने में मशीनों के पूजन से संकट दूर होने का वृत्तांत है।

फलश्रुति के अनुसार, जो भी इस कथा का श्रवण या पाठ करता है, उसके घर में लक्ष्मी का वास होता है और व्यापार में निरंतर सफलता मिलती है।

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