तो क्या भाजपा के लिए उप्र में संकटमोचक की भूमिका निभाएंगे एमएलसी ए.के. शर्मा?

MLC a.k. sharma

लखनऊ। देश के सबसे बड़े सूबे उप्र की राजनीति वैसे तो हमेशा से ही बहुत पेचीदगी भरी रही है लेकिन वर्तमान परिदृश्य को देखे तो यह बहुत अजीब है। प्रचंड बहुमत की भाजपा सरकार के मुखिया योगी आदित्यनाथ की व्यक्तिगत छवि यूं तो कोई ख़राब नहीं है लेकिन कोरोना की दूसरी लहर ने उनके सभी अच्छे कार्यों पर पानी फेर दिया।

अब इसे दैवी प्रकोप कहें या शासन-प्रशासन की अक्षमता, कोरोना की दूसरी लहर को प्रदेश सरकार अच्छी तरह से हैंडल नहीं कर पाई। बात चाहे बेड की अनुपलब्धता की हो या मेडिकल ऑक्सीजन की कमी; कोरोना से मरते लोग हों या लॉकडाउन की दुश्वारियां; जनता में मचा हाहाकार हो या सरकार को कोसते लोग, कहीं ना कहीं कमी तो रह गई।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रशासनिक अधिकारियों पर जरूरत से ज्यादा भरोसा किया। यही वजह कि वह चाहे टीम-11 हो या टीम-9 सभी ने हकीकत से ज्यादा आंकड़ों पर ध्यान दिया। नतीजा यह रहा कि जनता मरती रही और अधिकारी मुख्यमंत्री को आंकड़ो के जरिए खुश करते रहे।

वैसे तो मुख्यमंत्री योगी की ईमानदारी में कोई कमी नहीं है लेकिन जननेता के रूप में कहीं न कहीं उनका व्यक्तित्त्व कमजोर नजर आता है। मसलन एक जननेता, अधिकारियों से कहीं अधिक जनप्रतिनिधियों पर भरोसा करता है, मिलनसार होता है, soft spoken यानि नरमी से बोलने वाला होता है। याद करिए ऐसे ही तमाम मसलों को लेकर भाजपा के लगभग 200 विधायक अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने पर बैठ गए थे।

मुख्यमंत्री योगी इन्ही सब मामलों में फीके पड़ जाते हैं। वो अधिकारियों पर ज्यादा निर्भर रहते हैं। अब प्रशासनिक अधिकारी को तो चुनाव लड़ना नहीं है।

चुनाव तो राजनीतिक दलों के व्यक्तियों को लड़ना होता है और जनता सवाल भी उन्हीं से करती है। अधिकारी तो चाहे जिस की सरकार हो, रहेंगे आईएएस-आईपीएस ही और हर सरकार में वह अपनी जगह बना ही लेते हैं।

हकीकत तो यह भी है कि विफलता किसी की भी हो ठीकरा तो सत्ताधीशों पर ही फूटता है और वो भी तब जब विफलता के बाद या दौरान चुनाव हों, क्योंकि चुनाव ही वो मौका होता है जब जनता अपनी भड़ास वोटों के माध्यम से निकालती है और यही हुआ हाल ही में संपन्न हुए उप्र पंचायत के चुनाव में जब जनता ने भाजपा को उसके गढ़ों में ही बुरी तरह से नकार दिया।

दूसरी ओर कोरोना की दूसरी लहर में सरकार की अक्षमता के बीच एक व्यक्ति ऐसा भी था जिसने अपनी जिम्मेदारियों को बाखूबी निभाया और जहां की जिम्मेवारी उन्हें मिली थी वहां कोविड को समय रहते नियंत्रण में लाकर प्रधानमंत्री के साथ-साथ जनता की भी प्रशंसा के हकदार बना। वो व्यक्ति हैं पूर्व वरिष्ठ आइएएस अधिकारी व वर्तमान में भाजपा एमएलसी ए.के. शर्मा।

ए.के. शर्मा ने जिस तरह प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी सहित समूचे पूर्वांचल में कोविड नियंत्रण का कार्य सफलतापूर्वक किया वो उनकी प्रशासनिक क्षमता एवं कर्मठता का जीता जागता उदाहरण है।

प्रधानमंत्री ने कई बार अपने उद्बोधन में कोविड नियंत्रण के काशी मॉडल का जिक्र व तारीफ कर इस बात पर मुहर लगा दी कि उन्होंने ए.के. शर्मा को अपना दूत बनाकर भेजा तो वो उस पर खरे उतरे।

देखा जाय तो ए.के. शर्मा सही मायने में एक जननेता हैं। स्वयं प्रशासनिक अधिकारी रहे हैं इसलिए अधिकारियों की अच्छाई व बुराई दोनों जानते हैं। मिलनसार हैं, मृदुल स्वभाव के, विनम्रता से धीमी आवाज में बात करने वाले व्यक्ति हैं। जमीन से जुड़े होने के नाते जनता की तकलीफों को समझते हैं। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि के महत्त्व को भी जानते हैं।

जमीन से जुड़े होने की मिसाल यह है कि एमएलसी बनते की अपने गृह जनपद मऊ के सरकारी हॉस्पिटल में चिकित्सकों व अन्य स्टाफ की नियुक्ति करवाना, गोंड-धोरिया जाति को अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र देने का आदेश करवाना, वाराणसी, आजमगढ़ आदि जिलों में जनता से सीधे जुड़े छोटे-छोटे कई काम करवाना जिससे लोगों का सीधा संबंध है, उन्हें जननेता बनाता है।

अब सवाल यह उठता है कि ए.के. शर्मा की प्रशासनिक दक्षता व कर्मठता का उपयोग भारतीय जनता पार्टी पूरे प्रदेश के लिए क्यों नहीं कर रही है? शायद इसी को राजनीति कहते हैं या उप्र की राजनीति कहते हैं।

अब से कुल 9-10 महीने बाद ही उप्र की सबसे बड़ी पंचायत (विधानसभा) के चुनाव की सरगर्मियां प्रारंभ हो जाएंगी। जनता के अत्यधिक रोष को देखते हुए भाजपा की राह आसान नहीं बल्कि बेहद कठिन नजर आ रही है। ऐसे में यदि भाजपा को पुनः सत्तासीन होना है तो कुछ हटकर करना होगा।

वर्तमान नेतृत्त्व से जनता की नाराजगी को देखते हुए परिवर्तन आवश्यक है। सबसे बड़ी बात यह है कि देश को सबसे ज्यादा सांसद देने वाले उप्र से ही होकर दिल्ली का रास्ता जाता है। इतिहास गवाह है कि देश को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री उप्र ने ही दिया है।

तो यक्ष प्रश्न यह है कि क्या भाजपा इस बड़े परिवर्तन के लिए तैयार है? क्या भाजपा एमएलसी एके शर्मा को अपने संकटमोचक की भूमिका में देख रही है?    

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