
सरेंडर के बाद एनकाउंटर क्यों? भरत तिवारी मामले में JDU का पुलिस पर बड़ा हमला
Bihar News: बिहार के बक्सर जिले में हुए कथित भरत तिवारी एनकाउंटर का मामला अब केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि इसने राज्य की राजनीति में भी हलचल मचा दी है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में सवाल केवल विपक्ष ही नहीं उठा रहा, बल्कि सरकार में शामिल सहयोगी दल जनता दल यूनाइटेड (JDU) के वरिष्ठ नेता और मंत्री भी पुलिस कार्रवाई पर खुलकर सवाल खड़े कर रहे हैं।
बुधवार को बिहार सरकार के मंत्री और जेडीयू नेता अशोक चौधरी ने मीडिया से बातचीत के दौरान पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि भरत तिवारी ने आत्मसमर्पण कर दिया था, तो फिर उसे मारने की जरूरत क्यों पड़ी।
“सरेंडर किया था तो मारा क्यों?”
अशोक चौधरी ने कहा, “अगर कोई व्यक्ति मानसिक रूप से विचलित था और उसने सरेंडर कर दिया था, तो पुलिस को उसे गिरफ्तार करना चाहिए था। उसे थाने ले जाया जाता, कानूनी प्रक्रिया पूरी की जाती, मेडिकल जांच कराई जाती और जरूरत पड़ने पर इलाज के लिए भेजा जाता। इसके लिए पूरी व्यवस्था मौजूद है।”
उन्होंने आगे कहा कि कानून का काम अपराधी को पकड़कर न्यायालय के सामने पेश करना है, न कि आत्मसमर्पण करने के बाद उसकी जान लेना।
पुलिस की कार्रवाई पर बढ़ता विवाद
भरत तिवारी एनकाउंटर को लेकर शुरुआत से ही कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। परिजनों और समर्थकों का आरोप है कि यह एक फर्जी मुठभेड़ थी और भरत तिवारी ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। इसके बावजूद उन्हें गोली मार दी गई।
हालांकि पुलिस का दावा है कि कार्रवाई पूरी तरह परिस्थितियों के अनुरूप और आत्मरक्षा में की गई थी। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि एनकाउंटर के दौरान पुलिस टीम पर खतरा मंडरा रहा था और उसी के जवाब में कार्रवाई की गई।
सरकार के भीतर असहजता के संकेत
अशोक चौधरी के बयान को राजनीतिक हलकों में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वह राज्य सरकार में मंत्री हैं और सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा भी हैं। ऐसे में उनका पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाना सरकार के भीतर बढ़ती असहजता और दबाव की ओर संकेत माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मामला जिस तरह संवेदनशील होता जा रहा है, उससे सरकार पर निष्पक्ष जांच कराने का दबाव बढ़ सकता है।
विपक्ष को मिला नया मुद्दा
एनकाउंटर को लेकर विपक्षी दलों ने भी सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। विपक्ष का आरोप है कि राज्य में कानून के शासन की जगह एनकाउंटर संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है।
विपक्षी नेताओं ने पूरे मामले की न्यायिक जांच कराने और घटना के सभी तथ्यों को सार्वजनिक करने की मांग की है।
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पूर्वांचल की राजनीति पर भी पड़ सकता है असर
भरत तिवारी की सामाजिक और क्षेत्रीय पहचान को देखते हुए इस मामले का असर बिहार से बाहर उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्रों तक महसूस किया जा रहा है। खासतौर पर ब्राह्मण समुदाय के बीच इस घटना को लेकर चर्चा और नाराजगी देखी जा रही है।
राजनीतिक दल आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे पर अपनी रणनीति तैयार करने में जुट गए हैं। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे दल भी इस मुद्दे पर नजर बनाए हुए हैं।
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जांच और जवाबदेही की मांग तेज
जैसे-जैसे मामले को लेकर नए बयान सामने आ रहे हैं, वैसे-वैसे निष्पक्ष जांच और जवाबदेही की मांग भी तेज होती जा रही है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार इस विवाद को कैसे संभालती है और क्या इस मामले में किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी को जिम्मेदारी सौंपी जाती है।
फिलहाल इतना तय है कि भरत तिवारी एनकाउंटर बिहार की राजनीति में आने वाले दिनों में बड़ा मुद्दा बना रह सकता है और इसका असर आगामी चुनावी समीकरणों पर भी पड़ सकता है।
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