भारतीय महिलाओं में विटामिन-D की कमी

गर्भवती व रजोनिवृत्ति पश्चात महिलाएं विटामिन-D लें

दिल्ली। भारत में भरपूर धूप होने के बावजूद विटामिन डी की कमी आज एक आम पोषण संबंधी समस्या बन चुकी है। इसे अक्सर केवल हड्डियों की मजबूती से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन शरीर में इसकी भूमिका इससे कहीं अधिक व्यापक है। महिलाओं, पुरुषों, गर्भवती महिलाओं और विशेषकर रजोनिवृत्ति के बाद की महिलाओं के लिए पर्याप्त विटामिन डी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह जानकारी स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ एम.एस. (प्रसूति एवं स्त्री रोग) डॉ. स्नेहा मनचंदा ने दी।

भारत में किए गए अनेक अध्ययनों में विटामिन डी की कमी का बड़ा बोझ सामने आया है। भारत में किए गए 97 अध्ययनों को शामिल करने वाले एक विश्लेषण में विभिन्न समूहों में लगभग 61 प्रतिशत लोगों में विटामिन डी की कमी पाई गई। दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की प्रजनन आयु की महिलाओं पर किए गए एक अध्ययन में लगभग 88 प्रतिशत महिलाओं में इसकी कमी पाई गई। दक्षिण भारत के एक अध्ययन में शहरी महिलाओं में लगभग 75 प्रतिशत और ग्रामीण महिलाओं में 70 प्रतिशत महिलाओं में कमी मिली। इन अध्ययनों में जांचे गए समूह और तरीके अलग-अलग थे, फिर भी एक बात स्पष्ट है—भारत में विटामिन डी की कमी बहुत आम है और महिलाओं में यह विशेष चिंता का विषय है।

विटामिन डी शरीर में कैल्शियम और फॉस्फोरस के अवशोषण में मदद करता है। ये दोनों तत्व मजबूत हड्डियों और दांतों के लिए आवश्यक हैं। यह मांसपेशियों और प्रतिरक्षा तंत्र के सामान्य कार्य में भी भूमिका निभाता है।

 हार्मोन में कमी के कारण हड्डियों का क्षरण तेज

महिलाओं के जीवन में इसका महत्व विशेष है। किशोरावस्था और युवावस्था में पर्याप्त विटामिन डी और कैल्शियम हड्डियों की अधिकतम मजबूती विकसित करने में मदद करते हैं। गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान पोषण की आवश्यकता बढ़ जाती है, जबकि रजोनिवृत्ति के बाद स्त्री हार्मोन में कमी के कारण हड्डियों का क्षरण तेज हो सकता है। लंबे समय तक विटामिन डी की कमी और कैल्शियम का अपर्याप्त सेवन हड्डियों को कमजोर कर सकता है और आगे चलकर अस्थिक्षय तथा हड्डियों के टूटने का खतरा बढ़ा सकता है।

पुरुषों के लिए भी जरूरी है विटामिन-D

विटामिन-D केवल महिलाओं के लिए ही नहीं, पुरुषों के लिए भी जरूरी है। पुरुषों में भी इसकी कमी हड्डियों और मांसपेशियों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। कम धूप लेने वाले, अधिक वजन वाले, बुजुर्ग तथा कुछ विशेष रोगों से पीड़ित लोगों में इसकी कमी का खतरा अधिक हो सकता है।

गर्भावस्था में विटामिन-D का खास महत्व

का महत्व और बढ़ जाता है। उत्तर भारत में 418 स्वस्थ गर्भवती महिलाओं पर किए गए एक अध्ययन में 93.5 प्रतिशत महिलाओं में विटामिन-D की कमी पाई गई। चेन्नई में हुए एक अध्ययन में लगभग 62 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में इसकी कमी मिली। भारत के कई अध्ययनों के संयुक्त विश्लेषण में भी गर्भवती महिलाओं में इसकी कमी बहुत आम पाई गई। विटामिन-D गर्भावस्था में मां और बच्चे की हड्डियों के विकास तथा कैल्शियम के संतुलन के लिए महत्वपूर्ण है। कुछ अध्ययनों में कम विटामिन डी स्तर और गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप, गर्भकालीन मधुमेह, समय से पहले प्रसव तथा कम जन्म-वजन के बीच संबंध पाया गया है। हालांकि, केवल इस संबंध के आधार पर यह कहना उचित नहीं है कि विटामिन-D की कमी ही इन समस्याओं का कारण है।

बिना सलाह विटामिन-D लेना अनुचित

इसलिए प्रत्येक गर्भवती महिला को बिना चिकित्सकीय कारण के अधिक मात्रा में विटामिन-D लेना उचित नहीं है। कमी पाए जाने पर चिकित्सक की सलाह से उपचार किया जाना चाहिए।

इतनी धूप के बावजूद विटामिन-D की कमी क्यों?

जब भारत में इतनी धूप है, तो विटामिन डी की कमी क्यों होती है? इसका एक बड़ा कारण हमारी बदलती जीवनशैली है। घर, विद्यालय और कार्यालय के अंदर अधिक समय बिताना, शरीर का अधिकांश भाग कपड़ों से ढका होना, वायु प्रदूषण, त्वचा का रंग, मौसम और धूप में कम रहना—ये सभी शरीर में विटामिन डी बनने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए केवल धूप वाला देश होना पर्याप्त नहीं है।

भोजन से कैसे प्राप्त करें विटामिन-D?

भोजन से भी विटामिन डी प्राप्त किया जा सकता है, हालांकि प्राकृतिक रूप से यह बहुत कम खाद्य पदार्थों में पाया जाता है।

* वसायुक्त मछलियां, जैसे सार्डिन, मैकेरल, सालमन और टूना
* अंडे की जर्दी
* मछली के यकृत का तेल
* विटामिन डी से समृद्ध किया गया दूध और दुग्ध पदार्थ
* कुछ प्रकार के मशरूम

शाकाहारी लोगों के लिए विटामिन-D से समृद्ध किए गए खाद्य पदार्थ उपयोगी विकल्प हो सकते हैं।

हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए विटामिन डी के साथ पर्याप्त कैल्शियम भी जरूरी है। दूध और दुग्ध पदार्थ, रागी, तिल, हरी पत्तेदार सब्जियां और दालें कैल्शियम के अच्छे स्रोत हैं।

क्या हर व्यक्ति को विटामिन-D की गोली नहीं लेनी चाहिए।

विटामिन-D की आवश्यकता व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य, धूप में रहने की आदत और शरीर में इसके स्तर पर निर्भर करती है। बिना चिकित्सकीय सलाह के लंबे समय तक अधिक मात्रा में विटामिन डी लेने से शरीर में कैल्शियम का स्तर बढ़ सकता है और नुकसान हो सकता है। सामान्य दैनिक आवश्यकता और पहले से मौजूद कमी के उपचार की मात्रा अलग-अलग होती है। इसलिए चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ही इसकी जांच और उपचार कराया जाना चाहिए।

विटामिन-D की कमी से बचने के लिए संतुलित भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि और उचित मात्रा में धूप में समय बिताना महत्वपूर्ण है। आवश्यकता पड़ने पर चिकित्सक की सलाह से रक्त जांच और पूरक दवा ली जा सकती है। भारत में सूरज की रोशनी की कमी नहीं है, फिर भी विटामिन-D की कमी आम है। इसलिए जरूरत केवल धूप की उपलब्धता की नहीं, बल्कि ऐसी जीवनशैली की है जिसमें हम उचित पोषण, शारीरिक गतिविधि और स्वस्थ आदतों को स्थान दें। यह जानकारी स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ एम.एस. (प्रसूति एवं स्त्री रोग) डॉ. स्नेहा मनचंदा ने दी।

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