
UP के पार्को का अजब खेल; प्रतिमाओं की सुरक्षा में हर माह 5 करोड़ खर्च…
Uttar Pradesh: प्रदेश में कुछ वर्षो पूर्व जब बसपा यानी बहुजन समाज पार्टी का शासन था और मायावती मुख्यमंत्री थीं तब दलित प्रेम काफी उभरा था.
लखनऊ से नोएडा तक कई पार्क बनवाए गए, उसमें दलित महापुरुषों की विशालकाय प्रतिमाएं लगवाई गईं. साथ ही इनकी सुरक्षा में फोर्स भी लगाई गई.
इस फोर्स का अलग से नाम दिया गया विशेष परिक्षेत्र सुरक्षा वाहिनी. सरकार तो बदलती रहीं लेकिन, इन पार्कों को प्रदेश की धरोहर के रूप में जो नई सत्ता आई उसने संजोया. आज योगी सरकार में भी इन पार्कों और दलित महापुरुषों की प्रतिमाओं का संरक्षण हो रहा है.
400 प्रतिमाओं की सुरक्षा में 800 कर्मचारी: यूपी की राजधानी लखनऊ और दिल्ली एनसीआर के नोएडा में ऐसे 8 पार्क हैं जिनमें 400 से अधिक प्रतिमाएं लगी हैं. इनकी सुरक्षा में विशेष परिक्षेत्र सुरक्षा वाहिनी के लगभग 800 जवान और अधिकारी लगे हैं. खास बात यह है कि इन प्रतिमाओं की सुरक्षा में हर माह करीब 5 करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं.
24*7 होती है सुरक्षा: हर प्रतिमा के पास एक जवान की तैनाती 8 घंटे के लिए रहती है. 3 शिफ्ट में 24*7 की सुरक्षा में लगे इन जवानों की सैलरी भी अच्छी खासी है. लेकिन, सुरक्षा के लिए सिर्फ एक डंडा दिया गया है. जाड़ा-गर्मी बरसात में ये बिना किसी शेल्टर के अपनी सेवा दे रहे हैं और मेवा ले रहे हैं.
मायावती की प्रतिमा पर हमला: पिछले करीब 15 सालों में सुरक्षा की असल जरूरत सिर्फ एक बार पड़ी, जब 2012 में मायावती की प्रतिमा पर हमला हुआ था. उस हमले में प्रतिमा आसानी से तोड़ दी गई, जिससे व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए. इस सुरक्षा वाहिनी के सिपाही इतने बुरे हाल में हैं कि इन लोगों को हर मौसम में खुले में ही रहना पड़ता है. इनके लिए शेल्टर का कोई इंतजाम नहीं है. पत्थर की प्रतिमाओं की 24 घंटे तीन शिफ्ट में रखवाली की जाती है.
कहां हैं स्मारक पार्क: लखनऊ में प्रमुख लोकेशन हैं, अम्बेडकर मेमोरियल पार्क (भागीदारी भवन पथ, गोमती नगर), कांशीराम स्मारक पार्क और दलित चेतना स्थल नोएडा है. इसके अलावा हाथियों की सैकड़ों प्रतिमाएं हैं, जिनमें हाथियों की भी बड़ी संख्या है. इनकी स्थापना पर सरकारी खजाने से करीब 5 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए. जैसा कि विभिन्न रिपोर्ट्स में उल्लेख है. एक-एक कांस्य प्रतिमा की कीमत 45 लाख रुपक तक थी.
सुरक्षा व्यवस्था में 800 कर्मी लगे हैं, जो पुलिस विभाग के अधीन काम करते हैं. ये शिफ्टों में तैनात रहते हैं. सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक दिन की ड्यूटी और शाम 5 बजे से रात 1 बजे तक की ड्यूटी. फिर रात 1 बजे से सुबह नौ बजे तक ड्यूटी है.
सुरक्षा में तैनात जवान की सैलरी कितनी: प्रत्येक प्रतिमा के पास एक सिपाही की ड्यूटी है. तैनाती पैदल गश्त, फिक्स्ड प्वाइंट्स पर खड़े रहना और मोबाइल वाहनों से पेट्रोलिंग के रूप में होती है. हर पार्क में 50-100 कर्मी लगाए जाते हैं. सभी की शिफ्ट बदलती रहती है. इनकी मिनिमम तनख्वाह 50 हजार रुपए है और यह सभी स्थायी कर्मचारी हैं. चिकित्सा प्रतिपूर्ति और कुछ अन्य व्यवस्थाएं भत्ते के तौर पर प्राप्त होती हैं.
तकनीकी सुरक्षा: तकनीकी साधनों की स्थिति चिंताजनक है. कई पार्कों में सीसीटीवी लगे हैं, लेकिन वे पुराने हैं और पूरी कवरेज नहीं देते. अलार्म सिस्टम लगभग नदारद है, फेंसिंग आंशिक रूप से है. ऊंचाई कम होने से आसानी से पार की जा सकती है. मोबाइल पेट्रोलिंग वाहन हैं, पर संख्या सीमित. हर पार्क के लिए 2-3 वाहन.
कर्मचारियों के लिए कोई शेल्टर नहीं: राजेश सिंह, जो मायावती की प्रतिमा के पास तैनात हैं, उनका कहना है कि हमको इस ड्यूटी से कोई समस्या नहीं है. जाड़ा, गर्मी और बरसात हो हमारे लिए कोई शेल्टर नहीं है. हम प्रतिमाओं की सुरक्षा के लिए समर्पित हैं. मगर हमको भी कुछ सुविधाएं चाहिए.
क्या कहते हैं अधिकारी: बृजेश दुबे कहते हैं कि हमारी शिफ्ट समय-समय पर बदलती है. इसके अलावा हमारी नोएडा से लखनऊ भी ड्यूटी लगाई जाती है. विशेष परिक्षेत्र सुरक्षा वाहिनी की सेना नायक आईपीएस (IPS) अधिकारी प्राची सिंह कहती हैं कि सभी पार्कों के प्रभारी से रिपोर्ट तलब की गई है. सभी से पूछा गया है कि कर्मचारियों को क्या-क्या समस्याएं हैं. समस्याओं का संकलन होने के बाद उनके समाधान को लेकर सकारात्मक प्रयास किए जाएंगे.





