कर्नाटक कांग्रेस में सीएम पद का संकट… सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच खींचतान तेज

Karnataka CM: कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद की लड़ाई ने राजनीतिक माहौल को और गरम कर दिया है। कांग्रेस पार्टी के भीतर सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच चल रही खींचतान अब खुलकर सामने आ रही है। सिद्धारमैया, जो ओबीसी कुरुबा समुदाय से हैं, अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए सभी प्रयास कर रहे हैं, जबकि डीके शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय के समर्थन के साथ मुख्यमंत्री बनने की दावेदारी कर रहे हैं।

सीएम फॉर्मूले का विवाद
कर्नाटक में 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने मुख्यमंत्री पद को ढाई-ढाई साल के फॉर्मूले पर बांटने का निर्णय लिया था। सिद्धारमैया पहले ढाई साल मुख्यमंत्री बने और अब डीके शिवकुमार के कार्यकाल की बारी थी। लेकिन पार्टी हाईकमान की चुप्पी और अंदरूनी विवाद ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। डीके शिवकुमार समर्थक दिल्ली में विधायकों के साथ लगातार संपर्क में हैं और हाईकमान पर समझौते को लागू करने का दबाव बना रहे हैं।

मठ और समुदायों का असर
सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार की लड़ाई में आदिचुंचनगिरी मठ की एंट्री ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है। मठ के प्रमुख निर्मलानंद नाथ स्वामी ने डीके शिवकुमार के समर्थन में खुलकर बयान दिया और हाईकमान को जल्द निर्णय लेने का अल्टीमेटम दिया। वोक्कालिगा समुदाय, जिसका राजनीतिक प्रभाव करीब 14 प्रतिशत है, डीके शिवकुमार के साथ खड़ा है, जबकि सिद्धारमैया के समर्थन में ओबीसी और दलित वर्ग है।

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राजनीतिक निहितार्थ
विश्लेषकों का कहना है कि यदि कांग्रेस हाईकमान समय पर निर्णय नहीं लेता, तो वोक्कालिगा समाज निराश होकर अन्य राजनीतिक विकल्पों की ओर जा सकता है। वहीं, सिद्धारमैया के समर्थक दलित और ओबीसी नेताओं की लॉबिंग लगातार चल रही है। यह संघर्ष न केवल मुख्यमंत्री पद की लड़ाई है, बल्कि राज्य के सामाजिक और जातिगत समीकरणों पर भी प्रभाव डालता है।

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भविष्य की चुनौतियां
कांग्रेस के लिए यह चुनौती है कि वह अंदरूनी विवाद को सुलझाकर पार्टी के जनाधार को बनाए रखे। यदि हाईकमान ने समय पर फैसला नहीं लिया, तो राज्य में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है और विपक्षी दल इसका फायदा उठा सकते हैं। मुख्यमंत्री पद की यह जंग सिद्ध करती है कि कर्नाटक में मठों और समुदायों का राजनीतिक प्रभाव कितना महत्वपूर्ण है और पार्टी के लिए संतुलित निर्णय कितना आवश्यक है।

कुल मिलाकर, कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद की यह लड़ाई केवल दो नेताओं की नहीं बल्कि पार्टी, समुदाय और मठों के बीच संतुलन बनाए रखने की जटिल राजनीति का परिणाम है।

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