
पौराणिक और ऐतिहासिक है मकर संक्रांति पर खिचड़ी का पर्व, जाने महत्त्व…
Makar Sankranti 2026: हिन्दू सनातन धर्म में मकर संक्रांति इसलिए मनाते हैं क्योंकि इसका पौराणिक और ऐतिहासिक व आध्यात्मिक बहुत ही महत्वपूर्ण कारण है। सबसे पहले जानते हैं कि आखिर मकर है क्या?
खगोल शास्त्र और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, आकाश मंडल को 12 भागों में बांटा गया है जिन्हें ‘राशियां’ कहते हैं। मकर इन 12 राशियों में से दसवीं राशि है। ‘मकर’ का अर्थ संस्कृत में घड़ियाल या मगरमच्छ होता है। जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, तो उस प्रक्रिया को ‘संक्रांति’ कहते हैं। अतः जब सूर्य धनु राशि को छोड़कर ‘मकर राशि’ में प्रवेश करता है, तो उसे मकर संक्रांति कहा जाता है। दरअसल में मकर संक्रांति मनाने के मुख्य रूप से तीन बड़े कारण हैं।
उत्तरायण का प्रारंभ:
इस दिन से सूर्य उत्तर की दिशा में गति करना शुरू करते हैं। शास्त्रों में उत्तरायण को ‘देवताओं का दिन’ और दक्षिणायण को ‘देवताओं की रात’ कहा गया है। महाभारत के अनुसार, भीष्म पितामह ने अपनी मृत्यु के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की थी क्योंकि इस समय देह त्यागने पर मोक्ष मिलता है।
पिता-पुत्र का मिलन:
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सूर्यदेव और उनके पुत्र शनिदेव के बीच मतभेद थे। लेकिन मकर संक्रांति के दिन सूर्यदेव स्वयं अपने पुत्र शनिदेव के घर (मकर राशि शनि की स्वामित्व वाली राशि है) मिलने जाते हैं। यह दिन संबंधों में सुधार और कड़वाहट खत्म करने का प्रतीक है।
कृषि और आभार:
यह पर्व नई फसल के आने की खुशी में मनाया जाता है। किसान प्रकृति और सूर्यदेव को अपनी अच्छी फसल के लिए धन्यवाद अर्पित करते हैं।
शास्त्रों के अनुसार मकर संक्रांति पर दिनचर्या इस प्रकार से अवश्य होनी चाहिए।
ब्रह्म मुहूर्त स्नान: सूर्योदय से पूर्व जल में काले तिल और गंगाजल मिलाकर स्नान करना।
सूर्य उपासना: उगते सूर्य को तांबे के लोटे से जल अर्पित करना चाहिए।
खिचड़ी का भोग: चावल और उड़द की दाल की खिचड़ी बनाकर भगवान को भोग लगाना और स्वयं प्रसाद ग्रहण करना।
पितृ तर्पण: पूर्वजों के नाम पर जल में तिल छोड़कर तर्पण करना।
अग्नि पूजा: शाम को पवित्र अग्नि जलाकर उसमें तिल अर्पित करना।
तिल और गुड़ का दान और सेवन कराना चाहिए। क्योंकि तिल शनि का प्रतीक है और गुड़ सूर्य का। इन दोनों को मिलाकर खाने का अर्थ है कि सूर्य (पिता) और शनि (पुत्र) का मिलन हो रहा है, जो घर में सुख-शांति लाता है। वैज्ञानिक रूप से तिल और गुड़ सर्दी के मौसम में शरीर को गर्मी और ऊर्जा प्रदान करते हैं। हम यह पूरे विश्वास से कहते हैं कि इसका उल्लेख विष्णु पुराण और भविष्य पुराण में है। मकर संक्रांति पर तिल का दान करने वाला व्यक्ति नरक के दर्शन नहीं करता है।
खिचड़ी दान (उड़द दाल और चावल) इसलिए करते हैं क्योंकि चावल को चंद्रमा का, उड़द को शनि का, हल्दी को बृहस्पति का और घी को सूर्य का प्रतीक माना जाता है। खिचड़ी खाने और दान करने से कुंडली के ये सभी मुख्य ग्रह शांत और संतुलित होते हैं। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जनपद में स्थित गोरखनाथ मंदिर (नाथ संप्रदाय) की परंपराओं के अनुसार, बाबा गोरखनाथ ने इस परंपरा की शुरुआत की थी ताकि सैनिकों को पौष्टिक भोजन मिल सके। इसे ‘खिचड़ी पर्व’ भी इसीलिए कहा जाता है।
तांबे के बर्तन और ऊनी वस्त्रों का दान भी करने से सूर्य को तांबा अत्यंत प्रिय है। तांबे का दान कुंडली में सूर्य को मजबूत करता है जिससे समाज में मान-सम्मान और सरकारी कार्यों में सफलता मिलती है। वस्त्र दान दरिद्रता का नाश करता है। मत्स्य पुराण के अनुसार, संक्रांति के समय दिया गया दान 100 गुना फल प्रदान करता है।
पद्म पुराण (उत्तर खण्ड): इसमें मकर संक्रांति के दिन तिल के महत्व और ‘षटतिला’ (तिल के छह प्रयोग) का विस्तृत विवरण है।
निर्णय सिंधु: यह ग्रंथ हिंदू व्रतों और त्योहारों के समय और विधि का सबसे प्रामाणिक स्रोत माना जाता है। इसमें संक्रांति के पुण्य काल का सटीक वर्णन है।
देवी भागवत पुराण: इसमें सूर्य की गति और उत्तरायण के आध्यात्मिक महत्व का वर्णन है।
मकर संक्रांति के दिन उपवास रखकर तिल युक्त जल से स्नान करने और पितरों का तर्पण करने से अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। नारद पुराण में भी संक्रांति के स्नान और दान का विशेष उल्लेख मिलता है।
हालांकि उपरोक्त यह जानकारी धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं पर आधारित है। ज्योतिषीय उपाय अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार ही करने चाहिए।
लेखक-:
डॉ. जयशंकर प्रसाद शुक्ल
(वरिष्ठ पत्रकार)





