
UGC रेग्युलेशन 2026 पर नहीं थम रहा घमासान; अब सुप्रीम कोर्ट की एंट्री…
UGC Act Controversy: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के हाल ही में लागू किए गए रेग्युलेशन 2026 को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के लिए तैयार हो गया है।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ के समक्ष याचिका को तत्काल सूचीबद्ध (अर्जेंट हियरिंग) करने की मांग की गई, जिस पर कोर्ट ने साफ कहा—“हमें भी जानकारी है कि क्या हो रहा है। केस नंबर दीजिए और सुनिश्चित कीजिए कि याचिका की कमियां दूर कर दी गई हैं।”
क्या है पूरा मामला?
मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में UGC (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा) विनियम, 2026 को चुनौती देते हुए एक याचिका दाखिल की गई। यह याचिका राहुल दीवान एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के नाम से दायर की गई है, जिसकी डायरी संख्या 5477/2026 है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत के समक्ष मौखिक रूप से तत्काल सुनवाई की मांग की गई। वकील ने दलील दी कि नए रेग्युलेशन में कुछ ऐसे प्रावधान शामिल हैं, जिनका प्रभाव सामान्य वर्ग से जुड़े लोगों के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा देने वाला है, इसलिए इस पर तुरंत सुनवाई जरूरी है।
CJI की टिप्पणी
मामले को उठाए जाने के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट शब्दों में कहा,
“हमें भी जानकारी है कि क्या हो रहा है। पहले केस नंबर दीजिए और यह सुनिश्चित कीजिए कि याचिका में जो भी डिफेक्ट्स हैं, उन्हें दूर कर दिया गया है।”
इसके बाद याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को आश्वासन दिया कि याचिका में जो भी तकनीकी कमियां (डिफेक्ट्स) हैं, उन्हें जल्द ही दूर कर दिया जाएगा और मामले को सूचीबद्ध करने का अनुरोध दोहराया गया।
UGC रेग्युलेशन 2026 पर क्यों उठे सवाल
UGC ने यह नया रेग्युलेशन विश्वविद्यालय परिसरों में जाति-आधारित भेदभाव की समस्या से निपटने के उद्देश्य से लागू किया है। इसके तहत उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने और भेदभाव की शिकायतों से निपटने के लिए एक ढांचा तय किया गया है।
हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने रेग्युलेशन की धारा 3(सी) को लेकर आपत्ति जताई है।
धारा 3(सी) पर विवाद
UGC रेग्युलेशन 2026 की धारा 3(सी) के अनुसार,
“जाति-आधारित भेदभाव” का अर्थ है अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के सदस्यों के खिलाफ केवल उनकी जाति या जनजाति के आधार पर किया गया भेदभाव।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस परिभाषा के तहत भेदभाव के विरुद्ध दिया गया संरक्षण गैर-समावेशी (Non-Inclusive) है, क्योंकि इसमें अन्य वर्गों को समान रूप से शामिल नहीं किया गया है। उनका कहना है कि समानता को बढ़ावा देने के नाम पर बनाए गए नियम सभी नागरिकों के लिए समान सुरक्षा प्रदान नहीं करते, बल्कि वर्ग-विशेष तक सीमित रह जाते हैं।
याचिका में क्या कहा गया
याचिका में दावा किया गया है कि—
- रेग्युलेशन का मौजूदा स्वरूप संविधान के समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।
- भेदभाव के विरुद्ध संरक्षण सभी के लिए समान होना चाहिए।
- किसी एक वर्ग तक सीमित सुरक्षा से नया असंतुलन पैदा हो सकता है।
इसी आधार पर याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से धारा 3(सी) की संवैधानिक वैधता की जांच करने और इस पर रोक लगाने की मांग की है।
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सुप्रीम कोर्ट का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया है कि—
- वे केस नंबर के साथ याचिका को विधिवत प्रस्तुत करें,
- और उसमें मौजूद सभी तकनीकी कमियों को दूर करें।
इसके बाद ही मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किए जाने पर विचार किया जाएगा। माना जा रहा है कि यह मामला आने वाले दिनों में उच्च शिक्षा, आरक्षण और समानता से जुड़े बड़े संवैधानिक सवालों को जन्म दे सकता है।
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क्यों अहम है यह मामला
UGC रेग्युलेशन 2026 पर उठी यह कानूनी चुनौती केवल एक नियम तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े हैं—
- विश्वविद्यालयों में समानता की परिभाषा,
- जाति-आधारित भेदभाव से निपटने का तरीका,
- और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) की व्याख्या।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम रुख न सिर्फ शिक्षा संस्थानों की कार्यप्रणाली, बल्कि भविष्य की नीतियों पर भी गहरा असर डाल सकता है।
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