
अहम खनिजों और सेमीकंडक्टर सहयोग पर चीन की नजर, भारत-जापान को दी नसीहत…
India-Japan Annual Summit: एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच भारत और जापान की रणनीतिक साझेदारी लगातार मजबूत हो रही है। दोनों देशों ने हाल ही में महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals), सेमीकंडक्टर, क्वांटम तकनीक और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को मजबूत करने जैसे अहम क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है। इस घटनाक्रम के बाद चीन ने पहली बार सार्वजनिक प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि किसी भी दो देशों के बीच सहयोग का उद्देश्य किसी तीसरे देश के खिलाफ मोर्चा खोलना या क्षेत्रीय तनाव बढ़ाना नहीं होना चाहिए।
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Guo Jiakun ने शुक्रवार को मीडिया से बातचीत में कहा कि भारत और जापान के बीच बढ़ता सहयोग यदि क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और विकास को मजबूत करने के लिए है तो उसका स्वागत किया जा सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी साझेदारी ऐसी नहीं होनी चाहिए, जिससे किसी तीसरे पक्ष के हित प्रभावित हों या क्षेत्र में टकराव की स्थिति पैदा हो।
उन्होंने कहा, “देशों के बीच सहयोग आपसी विश्वास, समझ और साझा विकास को बढ़ावा देने के लिए होना चाहिए, न कि किसी तीसरे देश को निशाना बनाने या क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने के लिए।”
भारत-जापान ने रणनीतिक क्षेत्रों में बढ़ाया सहयोग
चीन की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है जब नई दिल्ली में प्रधानमंत्री Narendra Modi और जापान की प्रधानमंत्री Sanae Takaichi के बीच उच्चस्तरीय वार्ता हुई। बैठक में दोनों नेताओं ने भविष्य की तकनीकों और वैश्विक आर्थिक सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया।
वार्ता के दौरान अहम खनिजों की आपूर्ति सुनिश्चित करने, सेमीकंडक्टर निर्माण, क्वांटम तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), स्वच्छ ऊर्जा और मजबूत सप्लाई चेन विकसित करने जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई। दोनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि भविष्य की अर्थव्यवस्था और तकनीकी प्रतिस्पर्धा में इन क्षेत्रों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होगी।
क्यों अहम हैं Critical Minerals?
विशेषज्ञों के अनुसार लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, ग्रेफाइट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे महत्वपूर्ण खनिज आधुनिक उद्योगों की रीढ़ माने जाते हैं। इनका उपयोग इलेक्ट्रिक वाहनों (EV), स्मार्टफोन, कंप्यूटर चिप, बैटरियों, रक्षा उपकरणों, मिसाइल प्रणालियों, सौर ऊर्जा संयंत्रों और अन्य अत्याधुनिक तकनीकों के निर्माण में होता है।
वर्तमान समय में इन खनिजों की वैश्विक आपूर्ति का बड़ा हिस्सा चीन के नियंत्रण या प्रभाव में माना जाता है। ऐसे में भारत और जापान इन संसाधनों के वैकल्पिक स्रोत विकसित करने और आपूर्ति श्रृंखला को अधिक सुरक्षित एवं विविध बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।
सप्लाई चेन और सेमीकंडक्टर पर विशेष फोकस
कोविड-19 महामारी और उसके बाद वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता आर्थिक जोखिम पैदा कर सकती है। इसी कारण भारत और जापान दोनों सेमीकंडक्टर निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला के विविधीकरण पर विशेष ध्यान दे रहे हैं।
भारत पहले ही सेमीकंडक्टर निर्माण को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं शुरू कर चुका है, जबकि जापान इस क्षेत्र में तकनीकी विशेषज्ञता और निवेश के लिए विश्वभर में जाना जाता है। दोनों देशों की साझेदारी से इस क्षेत्र में नए निवेश और तकनीकी सहयोग की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
चीन-जापान संबंधों में पहले से है तनाव
चीन की प्रतिक्रिया को केवल भारत-जापान सहयोग तक सीमित नहीं माना जा रहा। पिछले कुछ वर्षों में चीन और जापान के बीच संबंध लगातार तनावपूर्ण रहे हैं। ताइवान, पूर्वी चीन सागर, समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय सैन्य गतिविधियों को लेकर दोनों देशों के बीच कई बार तीखी बयानबाजी हो चुकी है।
बीजिंग ने पहले भी जापान के उन बयानों पर कड़ी आपत्ति जताई थी, जिनमें ताइवान पर किसी संभावित सैन्य संकट की स्थिति में सुरक्षा सहयोग की बात कही गई थी। चीन ताइवान को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है और किसी भी बाहरी हस्तक्षेप का विरोध करता है।
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भारत की संतुलित विदेश नीति
भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि उसकी विदेश नीति किसी एक देश के खिलाफ नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों, आर्थिक विकास और रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित है। भारत जापान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों के साथ सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ चीन के साथ भी संवाद बनाए रखने की नीति अपनाता रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और जापान की साझेदारी मुख्य रूप से आर्थिक सहयोग, तकनीकी विकास, निवेश, हरित ऊर्जा, डिजिटल नवाचार और सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखला पर केंद्रित है। हालांकि, इसका रणनीतिक महत्व भी कम नहीं है, क्योंकि इससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन पर प्रभाव पड़ सकता है।
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इंडो-पैसिफिक में बढ़ेगा सहयोग
भारत और जापान दोनों स्वतंत्र, खुला और नियम-आधारित हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र के समर्थक हैं। दोनों देशों का मानना है कि समुद्री मार्गों की सुरक्षा, निर्बाध व्यापार और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन क्षेत्रीय शांति और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक है।
विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले वर्षों में भारत-जापान सहयोग केवल तकनीकी और आर्थिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रक्षा, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल अवसंरचना, स्वच्छ ऊर्जा और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में भी तेजी से विस्तार हो सकता है। ऐसे में चीन की प्रतिक्रिया यह संकेत देती है कि वह एशिया में बदलते रणनीतिक समीकरणों पर करीबी नजर बनाए हुए है।
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