सेना को मिलेंगे नए ‘पंख’! 22,000 फीट पर DRDO ने किया मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट का टेस्ट

DRDO: लद्दाख के न्योमा-मुध ड्रॉप जोन में 22,000 फीट की ऊंचाई से टेस्ट जंप, -15°C तापमान में स्वदेशी MCPS का सफल परीक्षण; DRDO की ADRDE लैब ने किया विकसित।

Leh: रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने भारत की रक्षा क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। लद्दाख के लेह जिले में करीब 22,000 फीट की ऊंचाई पर स्वदेशी मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम (MCPS) का सफल परीक्षण किया गया। यह परीक्षण बेहद चुनौतीपूर्ण मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों के बीच पूरा हुआ।

-15 डिग्री तापमान में किया गया परीक्षण
DRDO के मुताबिक, यह परीक्षण लद्दाख के न्योमा-मुध ड्रॉप जोन में किया गया। इसे दुनिया के सबसे ऊंचे ड्रॉप जोन में से एक माना जाता है। टेस्ट के दौरान जंपर्स ने समुद्र तल से करीब 22,000 फीट (AMSL) की ऊंचाई से छलांग लगाई।

जिस समय परीक्षण किया गया, उस दौरान वहां तापमान लगभग -15 डिग्री सेल्सियस था। इतनी ऊंचाई, कम तापमान और कठिन पहाड़ी परिस्थितियों के बावजूद पैराशूट सिस्टम का सफल परीक्षण किया गया।

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DRDO की लैब ने तैयार किया सिस्टम
इस स्वदेशी मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम को DRDO की एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट (ADRDE) लैब ने विकसित किया है। इसका सफल परीक्षण भारत की स्वदेशी एरियल डिलीवरी और सैन्य पैराशूट तकनीक में महत्वपूर्ण प्रगति माना जा रहा है।

MCPS को कठिन सैन्य अभियानों में जवानों की सुरक्षित पैराशूट लैंडिंग और एयरबोर्न ऑपरेशंस के लिए उपयोगी माना जाता है। खासतौर पर ऊंचाई वाले इलाकों में इस तरह की तकनीक सेना की परिचालन क्षमता बढ़ाने में मदद कर सकती है।

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रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में अहम कदम
DRDO लगातार देश में विकसित रक्षा तकनीकों के परीक्षण पर जोर दे रहा है। लद्दाख जैसे चुनौतीपूर्ण इलाके में MCPS का परीक्षण स्वदेशी रक्षा प्रणालियों की क्षमता को परखने का महत्वपूर्ण अवसर है।

22,000 फीट की ऊंचाई और माइनस 15 डिग्री तापमान जैसी कठिन परिस्थितियों में सफल परीक्षण से भारतीय सेना और वायुसेना के एयरबोर्न अभियानों के लिए इस तकनीक की उपयोगिता को लेकर उम्मीदें बढ़ी हैं।

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