गणेश चतुर्थी पर इस विधि से करें मूर्ति स्थापना, घर में बनी रहेगी सुख-समृद्धि!

Ganesh Chaturthi 2026: सनातन धर्म में श्री गणेश चतुर्थी का पर्व अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर पृथ्वी पर गणेशतत्त्व सामान्य दिनों की तुलना में हजार गुना अधिक सक्रिय रहता है। इस दौरान विघ्नहर्ता श्री गणेश की भावपूर्ण पूजा-अर्चना करने से साधक को उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन के सभी विघ्न दूर होते हैं।

इस व्रत को ‘सिद्धिविनायक व्रत’ के नाम से भी जाना जाता है और प्रत्येक परिवार में इसे पूरी निष्ठा के साथ मनाया जाता है।

हर साल नई गणेश मूर्ति स्थापित करने का कारण

कई लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि जब घर में पहले से ही गणपति की धातु या पत्थर की मूर्ति मौजूद है, तो हर साल नई मूर्ति की स्थापना क्यों की जाती है। शास्त्रों के अनुसार गणेश चतुर्थी के काल में ब्रह्मांड में गणेश तरंगें अत्यधिक मात्रा में प्रवाहित होती हैं। इन शक्तिशाली तरंगों का आवाहन जब पुरानी मूर्ति में किया जाता है, तो उसमें अपार शक्ति का संचार हो जाता है।

ऐसी अत्यधिक शक्ति वाली मूर्ति की वर्षभर नियमित और कठोर नियमों के साथ पूजा-सेवा करना एक आम गृहस्थ के लिए बहुत कठिन हो जाता है। इसलिए हर साल भाद्रपद चतुर्थी पर मिट्टी की नई मूर्ति में शक्ति का आवाहन कर उत्सव के बाद उसका विसर्जन करना ही शास्त्रसम्मत माना गया है।

गणेश मूर्ति का चयन

गणेश चतुर्थी के लिए हमेशा चिकनी मिट्टी से बनी मूर्ति का ही चयन करना चाहिए। प्लास्टर ऑफ पेरिस या केमिकल्स से बनी मूर्तियां न केवल धार्मिक दृष्टि से अनुचित हैं, बल्कि वे पर्यावरण के लिए भी गंभीर खतरा पैदा करती हैं। शास्त्रानुसार गणेश जी की मूर्ति पीढ़े पर विराजमान, बाईं ओर सूंड वाली और प्राकृतिक रंगों से सजी होनी चाहिए।

मूर्ति का आकार लगभग एक से डेढ़ फुट तक होना श्रेष्ठ माना जाता है। व्यक्तिगत पसंद या आडंबर के बजाय हमेशा शास्त्र में बताए गए मानकों के अनुसार ही सिद्धिविनायक की मूर्ति का चुनाव करना चाहिए।

घर में गणेश मूर्ति लाने का सही तरीका

गणेश मूर्ति को स्थापना वाले दिन से एक दिन पूर्व घर लाना सबसे उत्तम माना जाता है। घर के मुख्य पुरुष को अपने परिजनों के साथ शुद्ध मन और पारंपरिक हिंदू वेशभूषा जैसे धोती-अंगरखा या कुर्ता-पायजामा और टोपी पहनकर मूर्ति लेने जाना चाहिए। मूर्ति को हमेशा स्वच्छ रेशमी या सूती वस्त्र से ढककर घर लाएं।

मूर्ति लाते समय उसका मुख लाने वाले व्यक्ति की ओर और पीठ आगे की ओर होनी चाहिए, ताकि लाने वाले को सगुण तत्त्व और मार्ग में देखने वालों को निर्गुण तत्त्व का लाभ मिले। पूरे रास्ते ‘गणपति बाप्पा मोरया’ का जयघोष और नामजप करते रहना चाहिए।

द्वार पूजा और मूर्ति स्थापना की सही दिशा

जब गणेश मूर्ति को लेकर आप घर के मुख्य द्वार पर पहुंचें, तो सबसे पहले घर की सुहागिन महिला को मूर्ति लाने वाले व्यक्ति के चरणों पर जल और दूध अर्पित कर उनका स्वागत करना चाहिए। इसके बाद घर के भीतर प्रवेश करने से ठीक पहले मूर्ति का मुख सामने की ओर कर देना चाहिए। घर के अंदर लाने के बाद आरती उतारकर मूर्ति को पहले से सजाए गए सुंदर मंडप में स्थापित करें। पूजा की चौकी पर थोड़े चावल (अक्षत) रखकर उसके ऊपर गणेश जी को विराजमान कराया जाता है।

मूर्ति का मुख हमेशा पश्चिम दिशा की ओर रखना सबसे श्रेष्ठ होता है। यदि ऐसा संभव न हो, तो ध्यान रखें कि पूजा करने वाले व्यक्ति का मुख दक्षिण या पश्चिम दिशा की ओर न हो। दक्षिण दिशा उग्र देवताओं की मानी जाती है, इसलिए गणेश मूर्ति का मुख कभी भी दक्षिण की तरफ नहीं होना चाहिए।

गणपति जी की दैनिक पूजन विधि

जब तक गणेश जी आपके घर में विराजमान रहते हैं, तब तक प्रतिदिन सुबह और शाम नियमपूर्वक पंचोपचार पूजन करना अनिवार्य है। पंचोपचार पूजन में भगवान को चंदन, अक्षत, दूर्वा, धूप-दीप और मोदक या गुड़-नारियल का नैवेद्य अर्पित किया जाता है।

पूजन संपन्न होने के बाद परिवार के सभी सदस्यों को मिलकर भावपूर्ण आरती गानी चाहिए और मंत्रपुष्पांजलि का पाठ करना चाहिए। मूर्ति स्थापना के समय उसके नीचे रखे गए चावल पूजा के दौरान निर्मित चैतन्य से परिपूर्ण हो जाते हैं, जिन्हें उत्सव के बाद वर्षभर प्रसाद के रूप में अपने अन्न भंडार में रखा जा सकता है।

विसर्जन से पूर्व की पूरी विधि

गणेश मूर्ति के विसर्जन से ठीक पहले उत्तरपूजा करने का विधान है, जो भगवान के प्रति आभार व्यक्त करने का माध्यम है। उत्तरपूजा की शुरुआत आचमन और संकल्प से होती है। इसके पश्चात गणेश जी को पुनः चंदन, अक्षत, हल्दी-कुंकुम, सुंदर दूर्वा, धूप और दीप दिखाया जाता है। तत्पश्चात उन्हें विशेष मोदक या घर में बने सात्विक पकवानों का नैवेद्य अर्पित किया जाता है।

उत्तरपूजा के अंत में आरती उतारकर और हाथ जोड़कर मंत्रपुष्पांजलि अर्पित की जाती है। इसके बाद ही गणेश जी की मूर्ति को बहुत आदर के साथ चौकी से थोड़ा हिलाकर विसर्जन यात्रा के लिए उठाया जाता है।

गणेश मूर्ति विसर्जन की शास्त्रसम्मत प्रक्रिया

गणेश उत्सव की परंपरा के अनुसार मूर्ति का विसर्जन पहले, दूसरे, तीसरे, छठे, सातवें अथवा दसवें दिन किया जाता है। विसर्जन के लिए जाते समय गणेश जी के साथ दही, पोहे, नारियल और मोदक की पोटली बांधकर रखी जाती है। विसर्जन स्थल यानी किसी पवित्र नदी, तालाब या जलाशय के किनारे पहुंचकर अंतिम बार भगवान की आरती उतारी जाती है।

इसके बाद अत्यंत श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ श्री गणेश से वर्षभर घर में सुख-समृद्धि बनाए रखने और अगले वर्ष शीघ्र आने की प्रार्थना करते हुए मूर्ति को जल में प्रवाहित कर दिया जाता है। इस प्रकार शास्त्रोक्त विधि से किया गया गणेश पूजन जीवन के सभी विघ्नों को नष्ट कर घर में खुशहाली लाता है।

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