
पावन तपोभूमि नैमिषारण्य की पौराणिक कथा, जानें क्यों कलियुग के असर से मुक्त है ये धाम
Naimisharanya Chakratirth Story: सनातन धर्म में उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में गोमती नदी के तट पर स्थित नैमिषारण्य को अखंड ज्ञान और साधना का सबसे बड़ा केंद्र माना गया है। वराह पुराण, पद्म पुराण, स्कंद पुराण और श्रीमद्भागवत महापुराण में इस पावन धाम का विस्तृत उल्लेख मिलता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नैमिषारण्य (Naimisharanya) ही वह इकलौती पवित्र भूमि है जो कलियुग के दुष्प्रभावों से पूरी तरह मुक्त है। यहां स्थित चक्रतीर्थ और 88 हजार ऋषियों की साधना स्थली का इतिहास अत्यंत ही अद्भुत और अलौकिक है।
ऋषियों का ब्रह्मलोक प्रस्थान
द्वापर युग के अंतिम चरण और कलियुग के आगमन के समय महर्षि शौनक के नेतृत्व में 88 हजार ऋषि-मुनि अत्यंत चिंतित हो उठे। ऋषियों को ज्ञात था कि कलियुग में पाप, अधर्म, लोभ और हिंसा का प्रभाव बढ़ेगा, जिससे तपस्या और दीर्घकालीन यज्ञों का निर्विघ्न संपादन कठिन हो जाएगा।
इस संकट से मुक्ति और दीर्घ ज्ञान-यज्ञ के आयोजन के लिए सभी ऋषि जगत्स्रष्टा ब्रह्मा जी के पास ब्रह्मलोक पहुंचे। ऋषियों ने ब्रह्मा जी से प्रार्थना की कि वे किसी ऐसे परम सुरक्षित स्थान का मार्ग दिखाएं, जहां कलियुग का कोई प्रभाव न हो और सहस्र वर्षों तक ज्ञान-यज्ञ बिना किसी बाधा के संपन्न हो सके।
ब्रह्मा जी ने प्रकट किया दिव्य मनोमय चक्र
ऋषियों की धर्म-रक्षा और कल्याणकारी भावना से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने अपने मन के संकल्प से एक तेजोमय ‘मनोमय चक्र’ प्रकट किया। ब्रह्मा जी ने ऋषियों को निर्देश दिया कि वे इस चक्र के पीछे-पीछे गमन करें। उन्होंने कहा कि जिस स्थान पर इस दिव्य चक्र की नेमि (पहिया या बाहरी परिधि) विदीर्ण होकर गिर जाएगी, वही भूमि कलियुग के सभी दोषों से सर्वथा मुक्त होगी और वही उनकी अखंड साधना के लिए सर्वोत्तम तपोभूमि बनेगी।
चक्रतीर्थ का प्राकट्य और ‘नैमिषारण्य’ नामकरण
ब्रह्मा जी के आदेशानुसार ऋषिगण उस दिव्य चक्र के पीछे-पीछे चलते रहे। कई पर्वतों और वनों को पार करने के बाद वह चक्र गोमती नदी के किनारे स्थित एक सघन वन में गिरा। वहां चक्र की ‘नेमि’ क्षीण होकर पृथ्वी में धंस गई और पाताल से एक विशाल जलधारा फूट पड़ी। चक्र की नेमि के विशीर्ण (शीर्ण) होने के कारण इस वन का नाम ‘नैमिषारण्य’ पड़ा। वहीं जिस स्थान पर चक्र की धुरी गिरी, उसे आज ‘चक्रतीर्थ’ के नाम से जाना जाता है।
किसने शांत किया जलधारा का प्रचंड वेग
चक्र के धंसने से पाताल से निकली जलधारा का प्रवाह इतना तीव्र था कि संपूर्ण सृष्टि पर जलप्रलय का खतरा मंडराने लगा। ऋषियों के आकुल होकर प्रार्थना करने पर ब्रह्मा जी ने मां ललिता देवी (मां ललिता देवी शक्तिपीठ) का आह्वान किया। देवी ने तुरंत प्रकट होकर अपने दिव्य प्रभाव से जल के उस प्रचंड वेग को शांत किया और उसे एक सुंदर, गोल कुंड के रूप में स्थापित कर दिया।
18 महापुराणों और महाभारत का वाचन स्थल
इसके पश्चात महर्षि शौनक की अध्यक्षता में 88 हजार ऋषियों ने नैमिषारण्य में सहस्र वर्षों के महायज्ञ का शुभारंभ किया। इसी पावन तपोभूमि पर सूत जी ने शौनक आदि ऋषियों को 18 महापुराणों और महाभारत की कथाएं सुनाई थीं।
इसके साथ ही महर्षि वेदव्यास जी ने अपने शिष्यों को वेदों का गूढ़ ज्ञान यहीं प्रदान किया था। यही कारण है कि पौराणिक काल से लेकर आज तक नैमिषारण्य को सनातन संस्कृति और तपस्या का सर्वोच्च तीर्थ माना जाता है।





