
जब भगवान गणेश और कार्तिकेय के बीच हुई थी प्रतियोगिता
Lord Ganesha Wisdom Story: सनातन धर्म और पौराणिक ग्रंथों में भगवान श्री गणेश की तीव्र बुद्धि, विवेक और माता-पिता के प्रति अगाध भक्ति की अनेक कथाएं मिलती हैं। इन्हीं कथाओं में से एक प्रमुख और प्रेरणादायक प्रसंग उस प्रतियोगिता का है, जब देवाधिदेव महादेव और जगत जननी माता पार्वती ने अपने दोनों पुत्रों भगवान कार्तिकेय और श्री गणेश की बुद्धिमत्ता की परीक्षा ली थी।
इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि माता-पिता के चरणों में ही समस्त तीर्थ और संपूर्ण ब्रह्मांड समाहित होता है।
जब शिव-पार्वती ने रखी प्रतियोगिता
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार कैलाश पर्वत पर भगवान शिव और माता पार्वती के समक्ष यह प्रश्न उठा कि उनके दोनों पुत्रों में से कौन अधिक बुद्धिमान और श्रेष्ठ है। इस बात का निर्णय करने के लिए भगवान शिव ने एक प्रतियोगिता रखी। उन्होंने कार्तिकेय और गणेश जी को बुलाकर कहा कि जो भी अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर संपूर्ण ब्रह्मांड यानी पृथ्वी के तीन चक्कर सबसे पहले लगाकर वापस लौटेगा, उसे ही सबसे बुद्धिमान माना जाएगा और प्रथम स्थान दिया जाएगा।
‘मोर’ पर सवार होकर निकले कार्तिकेय
पिता की आज्ञा सुनते ही भगवान कार्तिकेय बिना क्षण भर का समय गंवाए अपने अत्यंत तीव्र गति वाले वाहन मोर पर सवार हुए और ब्रह्मांड की परिक्रमा करने के लिए गगनमार्ग से निकल पड़े। कार्तिकेय को अपनी गति और वाहन पर पूरा विश्वास था कि वे इस प्रतियोगिता को सरलता से जीत लेंगे।
गणेश जी ने लगाया ‘मूषक वाहन’
दूसरी ओर भगवान गणेश जी का वाहन मूषक (चूहा) था। मूषक की धीमी गति से संपूर्ण ब्रह्मांड का चक्कर समय पर लगाना अत्यंत कठिन था। ऐसे में गणेश जी ने अपनी कुशाग्र बुद्धि और विवेक का प्रयोग किया। वे शांत मन से उठे और उन्होंने अत्यंत आदरपूर्वक अपने पिता भगवान शिव और माता पार्वती को एक स्थान पर एक साथ बिठाया। इसके बाद उन्होंने श्रद्धा भाव से अपने माता-पिता के चारों ओर तीन बार परिक्रमा की और हाथ जोड़कर उनके समक्ष खड़े हो गए।
माता-पिता के चरणों में है ब्रह्मांड
जब भगवान शिव ने गणेश जी से पूछा कि उन्होंने ब्रह्मांड की परिक्रमा करने के बजाय माता-पिता की परिक्रमा क्यों की, तो गणेश जी ने अत्यंत मधुर और ज्ञानपूर्ण वाणी में उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि शास्त्रों और वेदों के अनुसार माता-पिता के चरणों में ही समस्त ब्रह्मांड और सभी पावन तीर्थ समाहित होते हैं। इसलिए माता-पिता की परिक्रमा करना ही संपूर्ण ब्रह्मांड की परिक्रमा करने के समान है।
गणेश जी बने प्रतियोगिता के विजेता
श्री गणेश की इस अनुपम बुद्धिमत्ता, तर्कशीलता और माता-पिता के प्रति अपार भक्ति को देखकर भगवान शिव और माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने गणेश जी को इस प्रतियोगिता का निर्विवाद विजेता घोषित किया। यह पौराणिक प्रसंग हमें सिखाता है कि जीवन में समस्याओं का समाधान केवल शारीरिक बल या गति से नहीं, बल्कि सही बुद्धि और विवेक से होता है। साथ ही यह कथा माता-पिता के प्रति सर्वोच्च सम्मान और पारिवारिक संस्कारों का संदेश देती है।





