
‘वन्दे मातरम्’ न गाने पर भी नहीं मिलेगा दंड…, सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
Supreme Court On Vande Mataram: राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा है कि यदि कोई नागरिक अपनी अंतरात्मा या धार्मिक मान्यताओं के आधार पर ‘वंदे मातरम्’ की एक या सभी पंक्तियां नहीं गाता है, तो उसके खिलाफ कोई आपराधिक दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार से दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
ऐतिहासिक फैसले की दिलाई याद
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने 1986 के प्रसिद्ध ‘बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य’ (Bijoe Emmanuel Case) फैसले का हवाला दिया। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक मान्यताओं के कारण राष्ट्रगान न गाने वाले लेकिन सम्मान में चुपचाप खड़े रहने वाले स्कूली बच्चों को संरक्षण प्रदान किया था।
अदालत ने दोहराया कि वह पुराना कानूनी सिद्धांत आज भी लागू है। केवल राष्ट्रगान या राष्ट्रीय गीत न गाना उसका अनादर नहीं माना जा सकता, इसलिए ऐसे व्यक्ति को जेल या दंडात्मक कार्रवाई का सामना नहीं करना पड़ेगा।
याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
यह पूरी सुनवाई मशहूर कर्नाटक संगीत गायक और लेखक टी. एम. कृष्णा द्वारा दायर याचिका पर हुई। याचिकाकर्ता ने ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971’ में वर्ष 2026 में किए गए उस संशोधन को चुनौती दी है, जिसके तहत वंदे मातरम् के गायन में बाधा डालने या इसे रोकने पर 3 साल तक की जेल का प्रावधान किया गया है।
याचिका में दलील दी गई कि वंदे मातरम् के अंतिम चार अंतरा (छंद) में देवी-देवताओं का आह्वान है, जिसे सभी नागरिकों के लिए अनिवार्य बनाना संविधान के धर्मनिरपेक्ष ढांचे और अनुच्छेद 25 व 26 के तहत मिले मौलिक अधिकारों के खिलाफ है।
कोर्ट करेगी दंडात्मक पहलू की समीक्षा
पीठ ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय गीत के साथ जुड़ी जनभावनाओं या इसके छंदों की संख्या (दो या छह) को तय करना अदालत का काम नहीं है, बल्कि यह सरकार और संसद का क्षेत्र है। हालांकि, कोर्ट इस बात की समीक्षा अवश्य करेगी कि क्या इसे न गाने पर किसी व्यक्ति को आपराधिक सजा के दायरे में लाना संवैधानिक रूप से सही है।
कोर्ट में तीखी बहस
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और याचिकाकर्ता के वकील एस. मुरलीधर के बीच तीखी नोकझोंक भी देखने को मिली। तुषार मेहता ने औपचारिक नोटिस जारी न करने की अपील करते हुए कहा कि संसद को कानून बनाने का अधिकार है और नीतियां नक्सलियों की मर्जी से नहीं तय हो सकतीं।
इस पर वरिष्ठ वकील मुरलीधर ने कड़ा एतराज जताते हुए शब्दों को वापस लेने की मांग की, हालांकि मेहता ने अपना बयान वापस लेने से इनकार कर दिया। मामले की अगली सुनवाई केंद्र का जवाब आने के बाद होगी।





