CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ SC में याचिका, SIR से जुड़े फैसलों पर जांच की मांग

Election Commission SIR Controversy: भारत का निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार इन दिनों गंभीर आरोपों को लेकर विवादों में हैं। विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों को लेकर उठे विवाद के बाद यह मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) के दरवाजे तक पहुंच गया है।

सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की अपील की गई है।

सुप्रीम कोर्ट में याचिका

सुप्रीम कोर्ट में वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दाखिल याचिका में कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा अपने पद का कथित दुरुपयोग करना और अन्य दोनों चुनाव आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी) की असहमति या अनदेखी कर फैसले लेना उनके आधिकारिक कर्तव्यों का हिस्सा नहीं माना जा सकता।

याचिका में तर्क दिया गया है कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act, 1950) की धारा 32 और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत आधिकारिक जिम्मेदारियों में हेरफेर या अनधिकृत बदलाव एक संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की श्रेणी में आता है। इसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को ‘सामान्य आरोपी’ की तरह जांच और कानूनी प्रक्रिया के दायरे में लाया जा सकता है।

क्या हैं मुख्य आरोप?

याचिका और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त पर निम्नलिखित प्रमुख आरोप लगाए गए हैं:

  • पिछले 10 महीनों (नवंबर 2025 से अगस्त 2026) के दौरान चुनाव आयुक्तों ने कम से कम 14 बार विभिन्न फैसलों पर लिखित में आपत्तियां और असहमति दर्ज कराई, जिन्हें कथित तौर पर नजरअंदाज कर दिया गया।

  • मतदाता पंजीकरण के लिए उपयोग होने वाले वैधानिक फॉर्म-6 में बिना बहुमत या उचित बजटीय/कानूनी संशोधन के नए नियम और शर्तें जोड़ी गईं।

  • SIR प्रक्रिया के दौरान करोड़ों की संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम हटाए जाने के आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में न्यायिक आयोग या विशेष जांच दल (SIT) के गठन की मांग की गई है।

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चुनाव आयोग और सत्ता पक्ष का रुख

इन आरोपों पर चुनाव आयोग (ECI) की ओर से स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा गया है कि किसी भी बहु-सदस्यीय संस्था में अलग-अलग विचार या सुझाव आना एक सामान्य और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग का कहना है कि विचार-विमर्श के बाद ही अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए जाते हैं।

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वहीं, सत्ता पक्ष की ओर से भी यह बात दोहराई गई है कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं में मतभेदों को संवैधानिक संकट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। विपक्ष इस मुद्दे को लेकर लगातार सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त पर हमलावर है और निष्पक्ष जांच व जवाबदेही तय करने की मांग कर रहा है।

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