देवी सुवर्चला ने अमृत क्यों ठुकराया, भगवान विष्णु हुए नतमस्तक?

Devi Suvarchala: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब क्षीरसागर के मंथन से चौदह दिव्य रत्न निकले, तो अंत में भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में अमृत-कलश लेकर प्रकट हुए। असुरों को छलने और देवताओं को अमर बनाने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया और बारी-बारी से सभी देवताओं को अमृत पान कराने लगे।

स्वर्गलोक के सभी देव उस अमृत की एक-एक बूंद के लिए लालायित थे, क्योंकि उसे पीकर वे सदा के लिए अमर और रोगमुक्त हो सकते थे। उसी देव-सभा में सूर्यदेव की तपस्वी और विदुषी पुत्री देवी सुवर्चला भी उपस्थित थीं।

जब सुवर्चला ने पीछे खींचे हाथ

जब मोहिनी रूपधारी श्रीहरि अमृत का पात्र लेकर देवी सुवर्चला के समीप पहुंचे और कटोरी आगे बढ़ाई, तो उन्होंने अपने दोनों हाथ पीछे खींच लिए। देवी ने मस्तक झुकाकर अत्यंत शांत स्वर में अमृत पीने से साफ इनकार कर दिया। यह देखकर देवराज इंद्र, देवगुरु बृहस्पति, अग्नि और वरुण देव अचंभित रह गए।

इंद्र ने इसे मूर्खता बताते हुए कहा कि जिस अमृत के लिए देव और दानव रक्तपात कर रहे हैं, उसे ठुकराना समझदारी नहीं है। इस पर मोहिनी रूप में भगवान विष्णु ने भी मंद मुस्कान के साथ उनसे इस त्याग का कारण पूछा।

अमरता से बड़ा करुणा का संकल्प

देवी सुवर्चला ने हाथ जोड़कर पूरी देव-सभा को संबोधित करते हुए कहा कि केवल अपने शरीर को सुरक्षित रखने के लिए अमर होना पत्थर बनने के समान है। यदि देवता अमृत पीकर अमर हो जाएंगे, लेकिन मृत्युलोक में मनुष्य, पशु और पक्षी रोगों से चीत्कार करेंगे, तो स्वर्ग में बैठकर उनका तमाशा देखना व्यर्थ है। उन्होंने कहा कि जो सत्ता दूसरों के दुख को न महसूस कर सके, वह अमर होकर भी मृतप्राय है।

सुवर्चला ने भगवान से कहा कि उन्हें अमरता नहीं बल्कि उस विष को शांत करने वाली ‘सहानुभूति’ का वरदान चाहिए, ताकि वे मृत्युलोक के जीवों की पीड़ा में उनके निवारण का मार्ग बन सकें।

भगवान विष्णु का चतुर्भुज स्वरूप

देवी सुवर्चला के निष्काम और करुणामयी विचार सुनकर अमृत पी रहे कई देवताओं के हाथ कांपने लगे। भगवान विष्णु ने तुरंत अपना मोहिनी रूप समेटा और अपने दिव्य चतुर्भुज नारायण स्वरूप में प्रकट हो गए। श्रीहरि ने देवी के सामने नतमस्तक होकर कहा कि जिसने अपने भीतर के स्वार्थ और मृत्यु के भय को जीत लिया, उसे किसी अमृत की आवश्यकता नहीं होती।

भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि अमृत पीने वाले देवता एक कल्प के बाद अपने पद से हट सकते हैं, लेकिन देवी सुवर्चला का यह करुणामयी स्वरूप आकाश में ‘स्वाति’ और ‘तपस्या’ की ज्योति बनकर हमेशा चमकता रहेगा।

Back to top button