27 नक्षत्र-कन्याएं और 12 महीनों के नाम का रहस्य, जानिए सोमनाथ ज्योतिर्लिंग से जुड़ी कथा

27 Nakshtra and 12 Months: सनातन पंचांग और हिंदू काल-गणना का आधार केवल खगोल विज्ञान ही नहीं, बल्कि इसके पीछे अध्यात्म, न्याय और दिव्य लीलाओं की एक गहरी गाथा छिपी हुई है। क्या आप जानते हैं कि हमारे हिंदी पंचांग के बारह मासों के नाम वस्तुतः सत्ताईस सहोदर बहनों के एक शाप, चंद्रमा के पश्चाताप और देवाधिदेव महादेव की असीम करुणा की कहानी से जुड़े हैं?

यह पौराणिक कथा प्रजापति दक्ष, चंद्र देव और भूलोक के प्रथम ज्योतिर्लिंग श्री सोमनाथ के प्राकट्य से जुड़ी हुई है।

प्रजापति दक्ष की 27 पुत्रियों से चंद्र देव का विवाह

सृष्टि के आरंभिक काल में जब समय और काल-विभाजन की कोई निश्चित व्यवस्था नहीं थी, तब प्रजापति दक्ष ने अपनी सत्ताईस गुणवती पुत्रियों का विवाह महर्षि अत्रि और माता अनुसूया के तेजस्वी पुत्र चंद्र देव से किया। विवाह से पूर्व दक्ष ने चंद्रमा से यह दृढ़ प्रतिज्ञा ली थी कि वे अपनी सभी पत्नियों के साथ समान व्यवहार और अनुराग रखेंगे।

विवाह के बाद चंद्र देव 27 नक्षत्र-कन्याओं में से सर्वाधिक रूपवती रोहिणी के प्रति अत्यधिक आसक्त हो गए और अपना सारा समय उन्हीं के साथ व्यतीत करने लगे। शेष 26 पत्नियों की निरंतर उपेक्षा और अपमान से दुखी होकर जब दक्ष को चंद्रमा के वचनभंग का पता चला, तो उनका पितृ-हृदय क्रोधाग्नि से भर उठा।

प्रजापति दक्ष का शाप

चंद्रमा की हठधर्मिता से क्रोधित होकर प्रजापति दक्ष ने उन्हें शाप दिया कि जिस सौंदर्य और कांति के अहंकार में उन्होंने धर्म की सीमाएं लांघी हैं, उनका वह तेज तत्काल नष्ट हो जाएगा। दक्ष के शाप के कारण चंद्र देव ‘क्षय रोग’ से ग्रस्त हो गए और उनकी रश्मियां प्रतिदिन क्षीण होने लगीं।

चंद्रमा के क्षय होने से संपूर्ण चराचर जगत में हाहाकार मच गया, महासागरों की तरंगे थम गईं और वनस्पतियों की वृद्धि रुक गई। संकट की इस घड़ी में पितामह ब्रह्मा जी की सलाह पर चंद्र देव सौराष्ट्र के प्रभास क्षेत्र पहुंचे और वहां बालू का पार्थिव शिवलिंग स्थापित कर महामृत्युंजय मंत्र का घोर तप शुरू किया।

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का प्राकट्य

छह माह की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए। शिव जी ने धर्म और वचन की रक्षा के लिए दक्ष के शाप को पूरी तरह समाप्त न करते हुए एक नया विधान रचा। महादेव ने कहा कि चंद्रमा पंद्रह दिन घटेंगे (कृष्ण पक्ष) और अगले पंद्रह दिन पुनः कला-दर-कला बढ़कर पूर्णता (पूर्णिमा) को प्राप्त करेंगे।

इसके बाद भगवान शिव ने चंद्रमा की अंतिम बची अमृतमयी कला को अपनी जटाओं में धारण कर लिया, जिससे महादेव ‘चंद्रशेखर’ कहलाए। प्रभास क्षेत्र में स्थापित वही दिव्य शिवलिंग आगे चलकर पृथ्वी का पहला ज्योतिर्लिंग ‘श्री सोमनाथ’ बना।

12 महीनों के नामकरण

सृष्टि के काल-चक्र को चलाए रखने के लिए यह व्यवस्था बनाई गई कि चंद्रमा प्रत्येक दिन एक नक्षत्र रूपी पत्नी के घर में निवास करेंगे। सूर्य के एक वर्ष के कालखंड में चंद्रमा लगभग बारह बार पूर्णिमा के पूर्ण स्वरूप में आते हैं। जिस मास की पूर्णिमा को चंद्रमा जिस नक्षत्र के सर्वाधिक समीप विराजमान होते हैं, उस मास का नाम उसी नक्षत्र-पत्नी के नाम पर समर्पित कर दिया गया:

चित्रा नक्षत्र से चैत्र, विशाखा से वैशाख, ज्येष्ठा से ज्येष्ठ, आषाढ़ा से आषाढ़, श्रवण से श्रावण, भाद्रपद से भाद्रपद, अश्विनी से आश्विन, कृत्तिका से कार्तिक, मृगशिरा से मार्गशीर्ष, पुष्य से पौष, मघा से माघ और फाल्गुनी नक्षत्र से फाल्गुन मास का नामकरण हुआ। इस प्रकार सनातन पंचांग में खगोल गणित और पौराणिक न्याय का अद्भुत संतुलन स्थापित हुआ।

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