
‘चीन की आंखों का मर गया पानी’, शशि थरूर ने बीजिंग के रवैये पर उठाए सवाल
Shashi Tharoor on China: नेपाल की आपदा के बीच शशि थरूर ने हिमालयी पर्यावरण संकट पर जताई चिंता, कहा- भारत, नेपाल और चीन एक ही पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा; बीजिंग के डेटा साझा करने के रवैये पर भी उठाए सवाल।
Delhi: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर ने नेपाल में आई हालिया प्राकृतिक आपदा के बहाने भारत, नेपाल और चीन के बीच पर्यावरणीय सहयोग का मुद्दा उठाया है। उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्र की पारिस्थितिकी तीनों देशों को आपस में जोड़ती है। राजनीतिक और सीमा विवाद अपनी जगह हैं, लेकिन जलवायु संकट से निपटने के लिए भारत, नेपाल और चीन को मिलकर काम करना होगा।
शशि थरूर ने नेपाल की आपदा पर लिखे अपने लेख में हिमालयी एशिया की नाजुक और आपस में जुड़ी पर्यावरणीय व्यवस्था का जिक्र किया। उन्होंने नेपाल के नेता रबी लामिछाने की एक टिप्पणी का हवाला देते हुए कहा कि भारत, चीन और नेपाल के बीच चाहे कितने भी भू-राजनीतिक तनाव और रणनीतिक मतभेद हों, तीनों देश एक ही हिमालयी पर्वत प्रणाली का हिस्सा हैं।
नेपाल की आपदा को जलवायु संकट से जोड़ा
थरूर ने कहा कि नेपाल में हुई प्राकृतिक आपदा को सिर्फ एक स्थानीय घटना के तौर पर नहीं देखा जा सकता। यह तेजी से बढ़ते ग्लोबल वॉर्मिंग और हिमालयी क्षेत्र में बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों का भी संकेत है।
हिमालयी क्षेत्र में तापमान बढ़ने के कारण ग्लेशियरों के पिघलने, ग्लेशियल झीलों के फैलने और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ रहा है। इसका असर सिर्फ उस देश तक सीमित नहीं रहता, जहां प्राकृतिक घटना घटती है। पहाड़ों से निकलने वाली नदियां भारत और नेपाल के मैदानी इलाकों तक पहुंचती हैं।
भारत, नेपाल और चीन एक ही पारिस्थितिकी का हिस्सा
शशि थरूर ने अपने लेख में इस बात पर जोर दिया कि हिमालय राजनीतिक सीमाओं से बंधा हुआ नहीं है। ग्लेशियर, नदियां, जलग्रहण क्षेत्र और मौसम की प्रणालियां देशों की सीमा रेखाओं के हिसाब से काम नहीं करतीं।
उनका कहना है कि हिमालय में किसी एक हिस्से में होने वाला बड़ा पर्यावरणीय बदलाव दूसरे देशों के लिए भी खतरा पैदा कर सकता है। इसलिए भारत, नेपाल और चीन को पर्यावरण और आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में साझा रणनीति तैयार करनी चाहिए।
चीन के रवैये पर शशि थरूर ने उठाए सवाल
थरूर ने चीन के साथ जल और पर्यावरण से जुड़े आंकड़ों को साझा करने के मुद्दे पर भी सवाल उठाए। उनका आरोप है कि बीजिंग का रवैया भारत और नेपाल के साथ कई मामलों में ‘लेनदेन’ वाला रहा है।
नदियों के जलस्तर, बारिश, ग्लेशियरों और संभावित बाढ़ से संबंधित आंकड़े समय पर साझा करना आपदा प्रबंधन के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। खासकर मानसून के दौरान शुरुआती चेतावनी मिलने से निचले इलाकों में रहने वाली आबादी को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
तिब्बती पठार का रणनीतिक और पर्यावरणीय महत्व
थरूर ने तिब्बती पठार के महत्व का भी उल्लेख किया। एशिया की कई प्रमुख नदी प्रणालियों का उद्गम या ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र हिमालय और तिब्बती पठार से जुड़ा हुआ है।
ब्रह्मपुत्र जैसी महत्वपूर्ण नदी तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो के नाम से बहती है और आगे भारत में प्रवेश करती है। ऐसे में तिब्बत में जल प्रवाह, ग्लेशियरों और पर्यावरण में होने वाले बदलावों की जानकारी भारत और नेपाल के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
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डेटा साझा करने के लिए मजबूत तंत्र की जरूरत
कांग्रेस नेता ने भारत, नेपाल और चीन के बीच एक मजबूत पर्यावरणीय और आपदा प्रबंधन तंत्र बनाने की जरूरत बताई। इसके तहत ग्लेशियरों की निगरानी, जलस्तर से संबंधित आंकड़ों का आदान-प्रदान और प्राकृतिक आपदाओं की शुरुआती चेतावनी व्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।
थरूर का तर्क है कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे के बीच इस तरह के सहयोग को केवल राजनीतिक संबंधों के उतार-चढ़ाव पर निर्भर नहीं रखा जाना चाहिए।
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हिमालय को लेकर साझा जिम्मेदारी जरूरी
शशि थरूर ने कहा कि भारत, नेपाल और चीन के बीच राजनीतिक और रणनीतिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन पर्यावरणीय चुनौतियां साझा हैं। हिमालय में होने वाले बदलाव का असर तीनों देशों की आबादी पर पड़ सकता है।
ऐसे में जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों के पिघलने, बाढ़ और जल सुरक्षा जैसे मुद्दों पर क्षेत्रीय सहयोग समय की जरूरत है। नेपाल की हालिया त्रासदी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि क्या हिमालयी देशों को आपदा आने के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय पहले से मिलकर तैयारी नहीं करनी चाहिए।
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