
मृत्यु ही अंतिम सत्य, शेष सब जीवन की एक यात्रा; जानें क्यों केवल कर्म ही जाता है साथ
लेखक: डॉ. अजय कुमार मिश्रा (ये लेखक के अपने विचार हैं)
Death is the Ultimate Truth: इंसान जब इस धरती पर जन्म लेता है, तभी से उसकी जीवन-यात्रा का शुभारंभ हो जाता है। जन्म और मृत्यु के बीच का यह सफर भले ही किसी के लिए लंबा हो और किसी के लिए छोटा, लेकिन इसकी अंतिम मंजिल पूरी तरह निश्चित है। संसार में आज तक ऐसा कोई व्यक्ति नहीं हुआ जिसे अमरत्व प्राप्त हुआ हो; जिसने भी जन्म लिया है, उसे एक न एक दिन मृत्यु को प्राप्त होना ही है।
हमारे आसपास ऐसे अनगिनत लोग थे जो कभी हमारे साथ हंसते-बोलते थे और सपने देखते थे, लेकिन आज वे इस दुनिया में नहीं हैं। किसी के पास अपार धन था तो किसी के पास सामाजिक वर्चस्व, लेकिन मृत्यु ने सभी को एक ही धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया। मृत्यु ही जीवन का सबसे बड़ा और समान सत्य है।
जीवन-चक्र का कड़वा एहसास
किसी अपरिचित के निधन पर हम संवेदना व्यक्त कर अपनी दिनचर्या में लौट जाते हैं, लेकिन जब कोई अपना चला जाता है तो उसका खालीपन हमें भीतर तक तोड़ देता है। इसका कारण यह है कि किसी अपने की मृत्यु केवल एक व्यक्ति को दूर नहीं करती, बल्कि उससे जुड़ी स्मृतियों और भावनाओं को झकझोर देती है।
किसी अपने को खोकर हम पहली बार यह भी गहराई से महसूस करते हैं कि एक दिन हमारी भी बारी आएगी। चाहे हम इसे ईश्वर की व्यवस्था मानें या प्रकृति का शाश्वत नियम, दोनों ही दृष्टिकोण हमें इसी निष्कर्ष पर लाते हैं कि जिस संसार को हम स्थायी समझकर जी रहे हैं, वह निरंतर परिवर्तनशील है और इसका अंत सुनिश्चित है।
भौतिक अंधी दौड़ के बीच अंतर्मन की आवाज
अधिकांश लोग जीवन का बड़ा हिस्सा धन, पद, प्रभाव और शक्ति हासिल करने की अंधी दौड़ में गंवा देते हैं। धन और सफलता प्राप्त करना गलत नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि उसके लिए कौन सा रास्ता चुना गया है। यदि इतिहास के पन्नों से हटकर हम अपने ही परिवार और आसपास के उन लोगों के इतिहास को देखें जो आज इस दुनिया में नहीं हैं, तो समझ आएगा कि उनके जाने के बाद उनका धन और पद यहीं छूट गया।
मृत्यु के बाद मनुष्य के साथ कुछ जाता है तो वह केवल उसका ‘कर्म’ है। अंतर्मन की आवाज हमेशा चेताती है कि जीवन की वास्तविक सफलता इस बात में नहीं कि कितना कमाया, बल्कि इसमें है कि हमने किसी जरूरतमंद की कितनी मदद की और समाज के प्रति अपने नैतिक दायित्वों को कितनी ईमानदारी से निभाया।
मृत्यु हमें डराने नहीं बल्कि जगाने आती है कि समय सीमित है और जीवन अनमोल है। हमारी वास्तविक पहचान उन भौतिक वस्तुओं से नहीं बनती जिन्हें हमने जमा किया, बल्कि उन सत्कर्मों से बनती है जो हमने दूसरों के लिए किए। जब जीवन का अंतिम पड़ाव आए, तो पीछे मुड़कर देखने पर यह संतोष होना चाहिए कि हमने जीवन को केवल जीया नहीं, बल्कि सार्थक ढंग से जीया है।




