
‘गया धाम’ में पिंडदान करने से इसलिए मिलता है पितरों को मोक्ष?
Gaya Dham Pindaan: सनातन धर्म में भाद्रपद और आश्विन मास में आने वाले पितृपक्ष का विशेष आध्यात्मिक महत्व बताया गया है। शास्त्रों में अपने पूर्वजों और पितरों की आत्मा की शांति तथा उनके मोक्ष के लिए बिहार स्थित पावन ‘गया धाम’ को सबसे सर्वश्रेष्ठ स्थान माना गया है। पद्म पुराण के उत्तर खंड में गया जी और वहां किए जाने वाले श्राद्ध, तर्पण व पिंडदान की अलौकिक महिमा का विशद वर्णन मिलता है।
मान्यता है कि गया जी में विधि-विधान से किया गया पिंडदान पितरों को यमलोक के समस्त कष्टों से मुक्त कराकर सीधे बैकुंठ धाम भेज देता है।
गयाजी का पौराणिक इतिहास
पद्म पुराण के अनुसार, प्राचीन काल में गयासुर नाम का एक अत्यंत प्रतापी और भगवान विष्णु का परम भक्त असुर हुआ। उसने हजारों वर्षों तक ऐसी घोर तपस्या की कि उसके तपोबल से तीनों लोक कांप उठे। जब भगवान विष्णु ने प्रकट होकर उससे वरदान मांगने को कहा।
फिर गयासुर ने लोक कल्याण के लिए वरदान मांगा कि उसका शरीर इतना पवित्र हो जाए कि जो भी जीव उसे देख ले या स्पर्श कर ले, उसके समस्त पाप भस्म हो जाएं और वह सीधे स्वर्गलोक को प्राप्त हो। भगवान विष्णु के इस वरदान से बड़े से बड़े पापी भी केवल गयासुर के दर्शन से स्वर्ग जाने लगे, जिससे यमलोक सूना होने लगा।
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भगवान विष्णु का प्रकटीकरण
सृष्टि का संतुलन और धर्म की मर्यादा बनाए रखने के लिए ब्रह्मा जी और देवताओं ने गयासुर से उसकी पवित्र देह पर एक विशाल यज्ञ करने के लिए स्थान मांगा। परम धार्मिक गयासुर सहर्ष तैयार हो गया और एक विशाल पर्वत के रूप में शिला बनकर लेट गया।
यज्ञ के दौरान उसकी देह को स्थिर रखने के लिए भगवान विष्णु स्वयं अपने ‘गदाधर’ रूप में प्रकट हुए और उन्होंने अपने श्रीचरण तथा दिव्य गदा गयासुर के सिर पर रख दी। भगवान विष्णु ने गयासुर की निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर वरदान दिया कि यह पवित्र भूमि उसके नाम से ‘गया क्षेत्र’ कहलाएगी।
भगवान ने कहा कि इस शिला और गयासुर की पवित्र देह पर जो भी मनुष्य अपने पूर्वजों के लिए श्रद्धापूर्वक श्राद्ध, तर्पण या पिंडदान करेगा, उसके पितृ यमलोक और प्रेतयोनि से तत्काल मुक्त होकर सीधे ब्रह्मलोक और बैकुंठ धाम को प्राप्त होंगे। गया धाम में एक बार भी विधि-विधान से पिंडदान करने पर कुल की २१ पीढ़ियों का पूर्ण उद्धार हो जाता है।
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अक्षय वट का पावन स्थल
गया जी में स्थित ‘अक्षय वट’ के नीचे पिंडदान करने से पितरों को कभी न समाप्त होने वाली यानी ‘अक्षय’ तृप्ति प्राप्त होती है। जो पूर्वज किसी दुर्घटना, अकाल मृत्यु या अनजाने में प्रेतयोनि में भटक रहे होते हैं, गया जी में पिंडदान से उन्हें तुरंत मुक्ति और उत्तम गति मिलती है।
पद्म पुराण का यह प्रसंग सिखाता है कि माता-पिता और पूर्वजों के प्रति ‘पितृ ऋण’ चुकाना हर मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है। गया धाम साक्षात भगवान विष्णु के चरणों से पवित्र भूमि है, जहां केवल तिल और जल का अर्पण भी पितरों के लिए मोक्ष का द्वार खोल देता है।
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