Bandar Review: बॉबी देओल की दमदार परफॉर्मेंस, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले ने बिगाड़ा खेल

Bandar Review: बॉबी देओल और सान्या मल्होत्रा स्टारर फिल्म ‘बंदर’ सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। अनुराग कश्यप ने इस फिल्म में जेल में कैदियों की हालत सहित कई सच्चाई पर से पर्दा उठाया।

Bandar Review: अनुराग कश्यप के निर्देशन में बनी फिल्म ‘बंदर’ आखिरकार 5 जून 2026 को दुनियाभर के सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है. रिलीज से पहले ही फिल्म का ट्रेलर दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बन गया था. ट्रेलर में दमदार डायलॉग्स, चौंकाने वाले ट्विस्ट और बॉबी देओल की प्रभावशाली स्क्रीन प्रेजेंस ने फिल्म के प्रति उत्सुकता बढ़ा दी थी. अब फिल्म रिलीज होने के बाद इसे दर्शकों और फिल्मी हस्तियों से सकारात्मक प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं

क्या है फिल्म ‘बंदर’ की कहानी?

‘बंदर’ की कहानी समर मेहरा (बॉबी देओल) के इर्द-गिर्द घूमते हुए नजर आती है। समर कभी इंडस्ट्री का बड़ा सितारा हुआ करता था, लेकिन धीरे-धीरे समय के साथ उसकी चमक फीकी पड़ने लग जाती है। वह अपनी गाड़ी को पटरी पर लाने की कोशिश करता है और अपनी डेटिंग ऐप पर मिली गर्लफ्रेंड ख़ुशी (सबा आजाद) के साथ रहने लगता है। लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आता है, जब एक रात पुलिस समर को उसके घर से पकड़ के ले जाती है। बाद में उसे पता चलता है कि गायत्री (सपना पब्बी) नाम की एक लड़की ने उस पर रेप का आरोप लगा दिया है।

गायत्री वो लड़की है, जो समर को उसी डेटिंग ऐप पर मिली थी। दोनों के बीच रिश्ता बना, लेकिन बाद में समर उसे ब्लॉक कर देता है, वहां से उसकी मुश्किलें शुरू हो जाती है। समर पुलिस वालों से कहता है कि उसने कुछ नहीं किया वह बेगुनाह है। लेकिन पुलिस उसे चैट के वो स्क्रीनशॉट दिखाती है, जो उसने गायत्री के साथ की थी। इसके बाद कहानी पुलिस हिरासत और जेल के अंदर होने वाली घटनाओं को दिखाती है।

फिल्म में एक्टिंग

अगर बंदर देखने की कोई सबसे बड़ी वजह है तो वह बॉबी देओल हैं। हाल के वर्षों में खलनायक वाली छवि के बाद यहां वह पूरी तरह अलग रूप में नजर आते हैं। टूटा हुआ आत्मविश्वास, अपमान का दर्द और भीतर की बेचैनी उन्होंने बहुत प्रभावी ढंग से दिखाई है। कई दृश्यों में बॉबी बिना ज्यादा संवाद बोले भी असर छोड़ जाते हैं। यह उनकी हालिया सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुतियों में से एक कही जा सकती है।

कैसा है फिल्म का डायरेक्शन

अनुराग कश्यप का निर्देशन कई जगह प्रभावशाली है, तो कई जगह कमजोर भी नजर आता है। जेल वाले बहुत से सीन बेचैन करते हैं और व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं। वहीं, लगभग 2 घंटे 20 मिनट की इस फिल्म में ज्यादातर कहानी बस जेल के अंदर की दिखाई गई है, जिसे देख कर मन में सवाल आया कि यह मूवी है या फिर जेल पर बनी कोई डॉक्यूमेंट्री।

कहाँ चूक गई फिल्म

अनुराग कश्यप की फिल्मों से हमेशा उम्मीद रहती है कि वे आसान सवाल नहीं पूछेंगी। फिल्म बंदर भी एक ऐसे विषय को उठाती है। एक ढलते हुए एक्टर और सिंगर पर लगा सीरियस आरोप, सोशल मीडिया की अदालत और जेल के भीतर की दुनिया। सुनने में यह सब बेहद दिलचस्प लगता है।

लेकिन दिक्कत तब शुरू होती है जब फिल्म एक जटिल विषय को समझने के बजाय सिर्फ एक पक्ष की पीड़ा दिखाने में उलझ जाती है। नतीजा यह होता है कि फिल्म सोचने पर मजबूर कम और थकाने का काम ज्यादा करती है।

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