Bhooth Bangla Review: कॉमेडी-हॉरर का फुल डोज, असरानी ने जीता दिल

Bhooth Bangla Review: भूत बंगला का फर्स्ट हाफ अक्षय कुमार और कॉमिक तिकड़ी की शानदार टाइमिंग से खूब हंसाता है. लेकिन सेकंड हाफ में हॉरर वाली कहानी कमजोर पड़ जाती है.

Bhooth Bangla Review: अगर आप अक्षय कुमार और प्रियदर्शन के सिनेमा के फैन हैं, उन्हें उसी पुराने अंदाज में देखना चाहते हैं जिसमें उनके memes वायरल होते हैं, तो ये फिल्म आपको जरूर पसंद आएगी. मंगलपुर में सेट ‘भूत बंगला’ आपको 47 साल पुरानी कल्ट फिल्म ‘जानी दुश्मन’ (Jaani Dushman) की थोड़ी बहुत याद दिलाएगी। हालांकि, अक्षय की फिल्म का प्लॉट माइथोलॉजी और काला जादू से जोड़कर पेश किया गया है। पढ़िए फिल्म का रिव्यू…

मंगलपुर के भूत बंगले के अमंगल

मीरा (मिथिला पालकर) अपने प्रेमी से राजी-खुशी शादी कर सके, इसलिए उसका भाई अर्जुन (अक्षय कुमार) और पिता वासुदेव आचार्य (जिशु सेनगुप्ता) हर जुगाड़-जतन कर रहे हैं. इसमें पंडितों के बताए उपाय से लेकर, वेडिंग डेस्टिनेशन खोजने तक काफी तामझाम है. पर अचानक पता चलता है कि मीरा के दादाजी, मंगलपुर के महाराज, उसके नाम अपना पुश्तैनी महल छोड़कर चल बसे हैं.

भाई-बहन को उनके पिता ने कभी ये महल-विरासत का मैटर बताया ही नहीं. तो अर्जुन इसी महल से मीरा की शादी करने का प्लान लिए मंगलपुर पहुंच चुका है. महल का मैनेजर शांताराम (असरानी) है. वेडिंग प्लानर जगदीश (परेश रावल) है. और जगदीश के साथ आया है उसका भांजा सुंदर (राजपाल यादव). लेकिन तभी ये रहस्य खुलता है कि वधूसुर राक्षस का मंगलपुर में प्रकोप है, इसलिए वहां कोई शादी नहीं करता.

कैसी है भूत बंगला?

प्रियदर्शन की कहानियों में अफरातफरी के एजेंट का रोल पूरी जान से निभाती आई परेश-असरानी-राजपाल की तिकड़ी इस बार भी फुल फॉर्म में है. अक्षय के साथ इस तिकड़ी की जुगलबंदी ने पूरा फर्स्ट हाफ संभाल रखा है. मगर भूत बंगला ऐसी हॉरर-कॉमेडी है, जिसने इन दोनों जॉनर को पूरी तरह अलग-अलग बांट दिया है. फर्स्ट हाफ की कॉमेडी को सेकंड हाफ का हॉरर जैसे ही ओवरटेक करता है, फिल्म का माहौल-हालात-जज़्बात सब बदल जाता है.

डायरेक्शन और राइटिंग

इंटरवल के बाद भूत बंगला में एक असुर की तपस्या से लेकर देवता-राक्षसों का युद्ध और आचार्य परिवार के इतिहास में दबे नेपोटिज्म के मामले तक काफी कुछ एक साथ आ जाता है. लेकिन सेकंड हाफ में फिल्म की राइटिंग बहुत कुछ एक साथ शुरू करके, उसे खत्म नहीं कर पाती. बाप-बेटे रिश्ते के दो धागे फिल्म खोलती है और उनमें गांठ लगाना भूल जाती है. नतीजा— फर्स्ट हाफ में वधूसुर का जो माहौल बना था, वो सेकंड हाफ में खुद वधूसुर की एंट्री से भी नहीं संभाल पाता और पूरा प्लॉट उधड़ता चला जाता है.

एक्टिंग 

अक्षय कुमार ने बढ़िया काम किया है। राजपाल यादव शानदार हैं उनकी कॉमिक टाइमिंग बढ़िया है। परेश रावल ने बहुत बढ़िया काम किया है, अक्षय राजपाल और परेश रावल की तिकड़ी ही फिल्म की जान है. असरानी साहब को आखिरी बार पर्दे पर देखकर मजा आता है.  tabu हर फ्रेम में कमाल हैं, Wamiqa Gabbi प्रमोशन में ज्यादा दिखीं फिल्म में कम, jisshu sengupta और मिथिला पार्कर ने अपने अपने रोल ठीक तरह से निभाए हैं.

फिल्म को लेकर अभी से बज़ है और दर्शकों में क्यूरियोसिटी भी दिख रही है, जिससे अच्छी ओपनिंग की उम्मीद की जा सकती है। हालांकि, आज के दर्शक सिर्फ स्टार पावर नहीं, बल्कि मजबूत कंटेंट चाहते हैं। अगर फिल्म की कहानी दमदार हुई और वर्ड ऑफ माउथ पॉजिटिव रहा, तभी ये बॉक्स ऑफिस पर टिक पाएगी।

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