
Israel Elections में पार्टी को वोट देते हैं लोग, भारत से कितनी अलग है चुनावी प्रक्रिया?
Israel elections 2026: इजरायल में 120 सीटों वाली संसद के लिए मतदान, सरकार बनाने को चाहिए 61 सीटें; जानें भारत से चुनावी व्यवस्था कितनी अलग है।
Israel: इजरायल में 27 अक्टूबर को आम चुनाव होने की बात कही गई है। इस चुनाव में देश के करीब 73 लाख मतदाताओं के वोट से तय होगा कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू सत्ता में बने रहेंगे या देश को नया नेतृत्व मिलेगा। इजरायल की चुनावी व्यवस्था भारत से कई मायनों में अलग है। यहां मतदाता सीधे किसी उम्मीदवार के बजाय राजनीतिक पार्टी को वोट देते हैं। संसद में प्रवेश के लिए किसी पार्टी को कम से कम 3.25 प्रतिशत वोट हासिल करना जरूरी है। वहीं, सरकार बनाने के लिए 120 सदस्यीय संसद में 61 सीटों का समर्थन चाहिए।
इजरायल में कैसे होता है चुनाव?
इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है। इसमें कुल 120 सदस्य होते हैं। देश में चुनाव के दौरान पूरे इजरायल को एक ही राष्ट्रीय निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है। यहां आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत मतदाता किसी पार्टी की सूची को वोट देते हैं और पार्टियों को मिले वोटों के अनुपात में संसद में सीटें आवंटित की जाती हैं।
इस व्यवस्था में किसी पार्टी को संसद में प्रतिनिधित्व हासिल करने के लिए कुल वैध वोटों का कम से कम 3.25 प्रतिशत प्राप्त करना होता है। इस न्यूनतम सीमा को चुनावी थ्रेशोल्ड कहा जाता है। जो पार्टी यह सीमा पार नहीं कर पाती, उसे संसद में सीटें नहीं मिलतीं।
सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की जरूरत
इजरायल में किसी पार्टी के लिए अकेले सरकार बनाने की राह आसान नहीं होती। संसद में बहुमत के लिए 61 सीटें जरूरी हैं। ऐसे में राजनीतिक दल चुनाव के बाद दूसरी पार्टियों के साथ गठबंधन करके सरकार बनाते हैं।
कई बार छोटी पार्टियों का समर्थन भी सरकार बनाने और उसे टिकाए रखने में निर्णायक भूमिका निभाता है। गठबंधन में शामिल दलों के बीच नीतियों, मंत्रालयों और राजनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर सहमति बनाना सरकार गठन का अहम हिस्सा होता है। गठबंधन में मतभेद होने पर सरकार के सामने राजनीतिक संकट भी पैदा हो सकता है।
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भारत से कितनी अलग है इजरायल की चुनावी व्यवस्था?
भारत और इजरायल की चुनावी प्रक्रियाओं में सबसे बड़ा अंतर उम्मीदवारों के चयन और सीटों के बंटवारे का है।
भारत में लोकसभा चुनाव के लिए देश को अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में बांटा गया है। प्रत्येक क्षेत्र से मतदाता अपने उम्मीदवार को वोट देते हैं। सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार जीतता है, भले ही उसे कुल वोटों का 50 प्रतिशत से कम हिस्सा मिला हो। इस व्यवस्था को फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली कहा जाता है।
इसके विपरीत, इजरायल में पूरे देश को एक निर्वाचन क्षेत्र मानकर पार्टियों को मिले वोटों के अनुपात में सीटें दी जाती हैं। मतदाता किसी पार्टी की सूची को चुनते हैं और पार्टी के हिस्से में आई सीटों के अनुसार उसके उम्मीदवार संसद में पहुंचते हैं।
भारत में लोकसभा की कुल 543 निर्वाचित सीटें हैं और केंद्र में सरकार बनाने के लिए सामान्यतः 272 सीटों का बहुमत जरूरी होता है। भारत में भी गठबंधन सरकारें बनती हैं, लेकिन इजरायल की आनुपातिक प्रणाली के कारण वहां संसद में कई छोटी पार्टियों का प्रतिनिधित्व होने की संभावना अधिक रहती है।
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इजरायल में गठबंधन की राजनीति क्यों अहम है?
इजरायल की चुनावी व्यवस्था में संसद में प्रवेश की न्यूनतम सीमा अपेक्षाकृत कम होने के कारण कई राजनीतिक दलों को प्रतिनिधित्व मिल सकता है। इससे संसद में अलग-अलग विचारधाराओं और हितों का प्रतिनिधित्व होता है, लेकिन किसी एक पार्टी के लिए स्पष्ट बहुमत हासिल करना मुश्किल हो सकता है।
इसी वजह से सरकार बनाने के लिए कई दलों को साथ आना पड़ता है। गठबंधन के सहयोगियों की मांगें और उनके बीच राजनीतिक मतभेद सरकार की स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं।
इस तरह इजरायल में चुनाव केवल सबसे बड़ी पार्टी चुनने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण होता है कि चुनाव के बाद कौन-से दल मिलकर बहुमत का आंकड़ा जुटा पाते हैं। यही इजरायल की चुनावी राजनीति को भारत की व्यवस्था से अलग बनाता है।
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