
KGMU Drug Scam: कैंसर पीड़ितों के हक पर डाका! KGMU लखनऊ में दवाओं का करोड़ों का हेरफेर
KGMU Drug Scam: लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में कैंसर मरीजों की महंगी दवाओं और इंजेक्शनों में गड़बड़ी का मामला सामने आया है। यूरोलॉजी विभाग के आरोपियों पर सख्त कार्रवाई।
KGMU Drug Scam: उत्तर प्रदेश की प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्था किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में मरीजों के हक की दवाओं की हेराफेरी का एक बड़ा मामला सामने आया है। केजीएमयू के यूरोलॉजी विभाग में कैंसर पीड़ितों और गंभीर मरीजों को दी जाने वाली महंगी दवाओं और इंजेक्शनों के वितरण में कथित तौर पर भारी वित्तीय अनियमितता और घोटाला (KGMU Drug Scam) उजागर हुआ है। मामले की गंभीरता को देखते हुए केजीएमयू प्रशासन ने तत्काल प्रभाव से कड़ा रुख अपनाया है और संदिग्ध कर्मचारियों के शहर छोड़ने पर पाबंदी लगा दी है।
आरोपियों का लखनऊ छोड़ने पर प्रतिबंध
मामला सामने आने के बाद केजीएमयू प्रशासन पूरी तरह से एक्शन मोड में आ गया है। यूरोलॉजी विभाग के दवा काउंटर पर तैनात संदिग्ध संविदा और आउटसोर्सिंग कर्मचारियों को तत्काल प्रभाव से उनके पटल (काउन्टर) से हटा दिया गया है।
प्रशासन को आशंका है कि आरोपी कर्मचारी सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं या कानूनी कार्रवाई के डर से शहर से फरार हो सकते हैं। इसी वजह से जांच पूरी होने तक किसी भी संदिग्ध कर्मी के लखनऊ से बाहर जाने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है।
दोषियों पर होगी सख्त कार्रवाई
केजीएमयू के प्रवक्ता डॉ. केके सिंह ने बताया कि मामले की जांच के लिए पांच सदस्यीय विशेष समिति गठित की गई है। समिति की अंतिम रिपोर्ट आते ही दोषी कर्मचारियों के खिलाफ न सिर्फ आर्थिक रिकवरी की जाएगी, बल्कि उनकी सेवाएं समाप्त कर कानूनी मुकदमा भी दर्ज कराया जाएगा। सिस्टम में पारदर्शिता लाने के लिए प्रशासन पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
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कैसे हुआ करोड़ों की दवाओं का यह खेल?
यूरोलॉजी विभाग में प्रोस्टेट, किडनी और पेशाब की थैली के कैंसर से पीड़ित मरीजों का इलाज किया जाता है। सरकार की ‘असाध्य योजना’ के तहत इन गरीब और लाचार मरीजों को अस्पताल की तरफ से बेहद महंगी दवाएं और इंजेक्शन मुफ्त में मुहैया कराए जाते हैं। इसी योजना की आड़ में खेल चल रहा था।
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अचानक बढ़ी खपत ने खोला राज: आंकड़े बताते हैं कि अक्टूबर और नवंबर 2025 में इस विभाग में जहां प्रति माह लगभग 10 लाख रुपये की दवाओं की खपत थी, वहीं फरवरी 2026 में यह आंकड़ा अचानक बढ़कर करीब 40 लाख रुपये और मार्च में 45 लाख रुपये के पार पहुंच गया।
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कागजों पर इंजेक्शनों की फर्जी एंट्री: दवाओं के इस अप्रत्याशित खर्च पर जब अधिकारियों को संदेह हुआ, तो उन्होंने डॉक्टरों के प्रिसक्रिप्शन (पर्चे) और बिलों का ऑडिट शुरू कराया। जांच में पता चला कि ताकत और प्रोटीन के जो इंजेक्शन मेडिकल गाइडलाइंस के मुताबिक किसी मरीज को 6 महीने में सिर्फ एक बार लगने चाहिए, उन्हें कागजों पर एक ही महीने में 4 से 5 बार लगाना दर्शा दिया गया। इनमें से प्रत्येक इंजेक्शन की कीमत 8 से 10 हजार रुपये के बीच है।
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