RSS प्रमुख भागवत ने विजयादशमी पर शस्त्र पूजा की, बोले- भारत विविधताओं का देश

RSS Vijayadashami 2026: RSS का वार्षिक विजयादशमी समारोह नागपुर के रेशिमबाग मैदान में आयोजित किया गया। कार्यक्रम में मोहन भागवत ने परंपरा के अनुसार शस्त्र पूजन किया। इसके अलावा, संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के स्मृति मंदिर स्थित स्मारक पर पुष्पांजलि भी अर्पित की गई।

इस आयोजन में पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और इजराइल के मुंबई स्थित कॉन्सुल जनरल यानिव रेवाच को भी कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया गया था।

भारत की विविधता को स्वीकारने पर जोर

मोहन भागवत ने कहा कि भारत की पहचान उसकी विविधता में निहित है। देश में अलग-अलग धर्मों, जातियों, भाषाओं, क्षेत्रों, खानपान और परंपराओं के लोग रहते हैं। इस विविधता को स्वीकार करना और उसकी रक्षा करना जरूरी है।

उन्होंने सामाजिक जीवन में आपसी समझ और भावनात्मक एकता को मजबूत करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, देश की एकता बनाए रखने के लिए लोगों के बीच आपसी संबंधों और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करना महत्वपूर्ण है।

संत रविदास के विचारों का किया उल्लेख

अपने संबोधन में संघ प्रमुख ने संत रविदास के विचारों और उनके सामाजिक योगदान का भी उल्लेख किया। उन्होंने सामाजिक समरसता, अपने मूल्यों के प्रति निष्ठा और समाज में विश्वास बनाए रखने के संदर्भ में संत रविदास के जीवन से प्रेरणा लेने की बात कही।

सरकार बदलने से ही समस्याओं का समाधान नहीं: भागवत

मोहन भागवत ने अपने भाषण में राजनीतिक और वैश्विक परिस्थितियों पर भी विचार रखे। उन्होंने कहा कि केवल सत्ता परिवर्तन से किसी देश की समस्याएं अपने आप समाप्त नहीं हो जातीं। उनके संबोधन में फ्रांस, अल्बानिया, नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों का उदाहरण भी सामने आया।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ वैश्विक शक्तियां अपने हितों के लिए देशों के भीतर मौजूद सामाजिक विभाजन और असंतोष का इस्तेमाल करती हैं। भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि विरोध या आंदोलन का उद्देश्य समस्याओं का समाधान खोजना होना चाहिए, न कि समाज में वैमनस्य और अव्यवस्था बढ़ाना।

RSS के 101वें स्थापना वर्ष का विशेष आयोजन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। वर्ष 2026 में संघ अपने 101वें स्थापना वर्ष में प्रवेश कर चुका है। इसी वजह से इस बार का विजयादशमी उत्सव संगठन की सौ वर्ष की यात्रा के बाद आगे की दिशा और प्राथमिकताओं के लिहाज से खास रहा।

मोहन भागवत का संबोधन सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता और भारत की विविधता जैसे विषयों पर केंद्रित रहा। उनके वक्तव्य में राजनीतिक बदलाव, वैश्विक परिस्थितियों और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी को लेकर भी संदेश दिया गया।

Back to top button