उप्र की राजनीति में भूमिहारों का क्या है महत्त्व व किसको मिलेगा समर्थन?

भगवान परशुराम

भारत के सबसे बड़े सूबे उप्र की राजनीति में जातिगत समीकरणों की तल्ख़ हकीकत को कोई नकार नहीं सकता। सार्वजानिक रूप से भले ही राजनीतिक दल इस बात को न स्वीकारें लेकिन सत्यता यही है कि उप्र की राजनीति पूरी तरह से जातिगत हो चुकी है।

वर्तमान में प्रदेश में विधानसभा के चुनाव चल रहे हैं । इस चुनाव में सभी दलों ने जातिगत समीकरणों के आधार पर ही अपने टिकटों का बंटवारा किया है। इन्ही जातियों में से एक है भूमिहार जाति, जो उप्र की 60 से 70 सीटों पर अपना प्रभाव रखती है।

कौन हैं भूमिहार?

भूमिहार एक भारतीय जाति है, जो उप्र, बिहार, झारखंड तथा थोड़ी-थोड़ी संख्या में अन्य प्रदेशों में निवास करती है। भूमिहार का अर्थ होता है ‘भूमिपति’, ‘भूमिवाला’ या भूमि से आहार अर्जित करने वाला (कृषक)। भूमिहार जाति के लोगों को भूमिहार ब्राह्मण भी कहा जाता है। 

शास्त्रों के अनुसार भगवान महर्षि परशुराम द्वारा अधर्म व अत्याचार करने वाले क्षत्रिय राजाओं का संहार करने के बाद ब्राह्मणों को शासक बनाया गया, इन्हीं ब्राह्मणों को ही बाद में बाभन या भूमिहार कहा गया। इतिहासकारों के अनुसार मगध के महान सम्राट पुष्य मित्र शुंग और कण्व दोनों ही राजवंश भूमिहार ब्राह्मण वंश से संबंधित थे। 

उप्र की राजनीति में भूमिहारों का क्या है महत्त्व?

भूमिहार काफी शिक्षि‍त जाति है। उप्र में इनकी संख्या भले ही कम हो लेकिन जातिगत रूप से इनमें जो एकता है वही इन्हें राजनीतिक रूप से मजबूत बनाती है। उप्र की राजनीति में भूमिहार हमेशा से ही खास रहे हैं। शुरू से ही भूमिहार जाति को राजनीति में तवज्जो मिली है।  

यूपी में सरकार किसी भी पार्टी की रही हो, भूमिहार नेताओं को हमेशा ख़ास जगह मिली। राजनरायण, गौरी शंकर राय, झारखंडे राय, गेंदा बाबू, त्रिवेणी राय, कृष्णानंद राय, रासबिहारी, विश्वनाथ राय, पंचानन राय, कल्पनाथ राय, कुंवर रेवती रमण सिंह ने उप्र की राजनीति में भूमिहार जाति का प्रतिनिधि‍त्व पूरी ताकत के साथ किया।

Late Krishnanand Rai

पिछले 8-10 वर्षों का राजनितिक इतिहास देखें तो भाजपा ने भूमिहारों को सर्वाधिक महत्त्व दिया है। इन्ही वर्षों में भूमिहारों के एक बड़े नेता का उदय हुआ जिनका नाम मनोज सिन्हा है।

manoj sinha arvind sharma

मनोज सिन्हा को 2014 की मोदी सरकार में मंत्री बनाया गया और दो-दो विभागों का दायित्त्व सौंपा गया। यहां तक कि 2019 में सांसदी का चुनाव हारने के बावजूद मनोज सिन्हा को जम्मू कश्मीर का उप-राज्यपाल बनाया गया जिसकी अंतर्राष्ट्रीय महत्ता है।

2017 के विधानसभा व 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 8 टिकट भूमिहार समाज के लोगों को दिया और 2022 में भाजपा ने 10 भूमिहारों को टिकट दिए, जबकि सपा ने 4 टिकट और बसपा ने एक भी टिकट नहीं दिया।

वर्तमान विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अजीत पाल त्यागी को मुरादनगर (गाजियाबाद), सत्यवीर त्यागी को किठोर (मेरठ), सूर्य प्रताप शाही को पथरदेवा (देवरिया), असीम राय को तमकुही राज (कुशीनगर), उपेंद्र तिवारी को फेफना (बलिया), सत्येंद्र राय को गोपालपुर (आजमगढ़), अलका राय को युसुफपुर मोहमदाबाद (गाजीपुर), अवधेश सिंह को पिंडरा (वाराणसी), सुभाष राय को जलालपुर (अम्बेडकरनगर) से टिकट देकर भूमिहार समाज को सम्मानित करने का काम किया।

इसके अतिरिक्त एक साल पहले भूमिहार समाज से दो एमएलसी (ए.के. शर्मा व अश्वनी त्यागी) बनाकर भाजपा ने कम संख्या होने के बावजूद इस समाज को मान सम्मान दिया।

ak sharma with pm modi

ए.के. शर्मा को तो भाजपा का प्रदेश उपाध्यक्ष भी बनाया गया जबकि उन्होंने अभी मात्र एक साल पहले आइएएस से त्यागपत्र देकर भाजपा ज्वाइन की। ए.के. शर्मा की कर्मठता व योग्यता को देखते हुए वर्तमान विधानसभा चुनाव में वह भाजपा के प्रमुख चुनावी रणनीतिकरों में से हैं।

साथ ही उन्हें उप्र विधानसभा चुनाव में भाजपा का संकल्प पत्र बनाने वाली टीम में भी जगह दी गई। चर्चा यह भी है कि यदि भाजपा की सरकार बनती है तो है ए.के. शर्मा को मंत्रिमंडल में महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जाएगी। 

ak sharma pm modi

भूमिहार समाज के नेता इस बात को खुले रूप से स्वीकारते हैं कि उनका अस्तित्व सिर्फ भाजपा में ही है। वैसे भी 2005 में हुई भाजपा के तत्कालीन विधायक और पूर्वांचल में भूमिहारों के बड़े नेता कृष्णानंद राय की हत्या को भूमिहार समाज अभी तक नहीं भूल सका है।

भले ही कृष्णानंद राय की हत्या के आरोप से बाहुबली मुख्तार अंसारी कोर्ट से बरी हो गए हो लेकिन भूमिहार समाज की अदालत से बरी नहीं हुए हैं।

इतना ही नहीं वर्ष 1991 में वाराणसी के चेतगंज इलाके में अवधेश राय हत्याकांड का इल्जाम भी मुख्तार अंसारी पर ही है। यह प्रकरण अदालत में अब भी लंबित है। ऐसे में योगी सरकार द्वारा मुख्तार अंसारी व उनके कुनबे की हुई दुर्गति से भूमिहार समाज का प्रसन्न होना स्वाभाविक है।

अब वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में इस समाज का समर्थन किसे मिला है? यह तो 10 मार्च को आने वाले नतीज़े से ही तय होगा लेकिन इस प्रभावशाली व बुद्धिजीवी समाज के वोट बैंक को अपनी तरफ करने के लिए सभी दलों ने सारे दांव आजमाए हैं।

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