
‘तेल का खेल’ और तख्ता पलट… वेनेज़ुएला संकट भारत के लिए चुनौती?
US Venezuela Conflict: दक्षिण अमेरिकी देश वेनेज़ुएला एक बार फिर वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाज़ार के केंद्र में आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों ने संकेत दिए हैं कि अमेरिका वेनेज़ुएला के विशाल तेल भंडारों को अपने रणनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल करना चाहता है। ट्रंप ने साफ़ कहा है कि अमेरिका तब तक वेनेज़ुएला को “चलाएगा”, जब तक वहाँ सत्ता का “सुरक्षित और सही” परिवर्तन नहीं हो जाता।
हालांकि यह सत्ता परिवर्तन कैसे होगा, इस पर अभी तस्वीर साफ़ नहीं है, लेकिन जानकार मानते हैं कि मौजूदा घटनाक्रम का केंद्र बिंदु लोकतंत्र से अधिक तेल संसाधन हैं।
दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार
वेनेज़ुएला के पास अनुमानित 303 अरब बैरल से अधिक कच्चे तेल का भंडार है, जो दुनिया में सबसे ज़्यादा है। अमेरिकी राष्ट्रपति चाहते हैं कि अमेरिकी तेल कंपनियाँ वेनेज़ुएला में अरबों डॉलर का निवेश करें, जर्जर हो चुके तेल इंफ्रास्ट्रक्चर को दोबारा खड़ा करें और बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू करें।
व्हाइट हाउस ने भले ही अभी तक कोई आधिकारिक नीति दस्तावेज़ जारी नहीं किया हो, लेकिन ट्रंप के बयान यह संकेत देते हैं कि अमेरिका वेनेज़ुएला के तेल सेक्टर पर निर्णायक नियंत्रण चाहता है।
भारत का वेनेज़ुएला कनेक्शन
अमेरिकी प्रतिबंधों से पहले भारत वेनेज़ुएला के कच्चे तेल का बड़ा खरीदार रहा है। भारत उन गिने-चुने देशों में शामिल है जिनके पास वेनेज़ुएला के भारी (Heavy) कच्चे तेल को रिफ़ाइन करने की तकनीकी क्षमता है।
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक एक समय भारत वेनेज़ुएला से रोज़ाना करीब 4 लाख बैरल कच्चा तेल आयात करता था। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते 2020 के बाद यह आयात लगभग बंद हो गया।
वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार नवंबर 2025 तक भारत के कुल तेल आयात में वेनेज़ुएला की हिस्सेदारी सिर्फ़ 0.3 प्रतिशत रह गई थी।
भारत का निवेश और फंसा हुआ पैसा
भारत की सरकारी कंपनी ONGC विदेश लिमिटेड (OVL) पूर्वी वेनेज़ुएला के सेन क्रिस्टोबाल ऑयलफील्ड में 40 प्रतिशत हिस्सेदारी रखती है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण तकनीक और उपकरणों की कमी से यह परियोजना घाटे में चली गई और संचालन रोकना पड़ा।
पीटीआई के अनुसार वेनेज़ुएला पर ओवीएल की करीब एक अरब डॉलर की देनदारी फंसी हुई है। मौजूदा घटनाक्रम से यह उम्मीद जताई जा रही है कि इस राशि की वसूली का रास्ता खुल सकता है।
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भारत को क्या मिल सकता है?
विशेषज्ञों की राय इस मुद्दे पर बंटी हुई है।
- केप्लर के सीनियर एनालिस्ट निखिल दुबे का कहना है कि अगर अमेरिका वेनेज़ुएला पर लगे प्रतिबंधों में ढील देता है, तो भारत को रियायती दरों पर भारी कच्चा तेल मिल सकता है, जिसे भारत की जटिल रिफ़ाइनरियाँ आसानी से प्रोसेस कर सकती हैं।
- वहीं ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इंस्टीट्यूट के अजय श्रीवास्तव मानते हैं कि अमेरिका वेनेज़ुएला के तेल को ख़ुद रिफ़ाइन कर वैश्विक बाज़ार में बेचेगा, ऐसे में भारत को कोई सीधा लाभ मिलना मुश्किल है।
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रूस से तेल और अमेरिकी दबाव
भारत अपनी तेल ज़रूरतों का करीब 88 प्रतिशत आयात करता है और हाल के वर्षों में रूस पर निर्भरता बढ़ी है। इसे लेकर अमेरिका ने भारत पर टैरिफ़ भी लगाए हैं और रूस से तेल ख़रीद कम करने की चेतावनी दी है। इस पृष्ठभूमि में वेनेज़ुएला का तेल भारत के लिए एक वैकल्पिक स्रोत बन सकता है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा बढ़े और सौदेबाज़ी की ताक़त मजबूत हो।
फिलहाल यह साफ़ है कि वेनेज़ुएला के तेल पर अंतिम नियंत्रण अमेरिका के हाथ में रहने की संभावना अधिक है। भारत को सीधा लाभ तभी मिल सकता है, जब अमेरिकी नीतियों में ढील दी जाए और भारत को वेनेज़ुएला के कच्चे तेल तक प्रत्यक्ष पहुंच मिले। तब तक यह पूरा घटनाक्रम भारत के लिए संभावनाओं वाला, लेकिन अनिश्चित बना रहेगा।
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